बंटवारे में घर छूटा, मुंबई में गैराज की नौकरी की और फिर शब्दों से ऐसी दुनिया रची कि ऑस्कर से ज्ञानपीठ तक सम्मान मिला। जानिए गुलजार के यादगार सफर की कहानी।
नई दिल्ली: कुछ शब्द ऐसे होते हैं जो सिर्फ पढ़े नहीं जाते, सीधे दिल में उतर जाते हैं। कुछ गीत ऐसे होते हैं जो खत्म होने के बाद भी भीतर कहीं जिंदा रहते हैं। और कुछ शायर ऐसे होते हैं, जिनकी लिखी पंक्तियों में हमें अपनी ही जिंदगी का कोई भूला हुआ पल नजर आ जाता है। गुलजार ऐसे ही रचनाकार हैं। उन्होंने बारिश को सिर्फ मौसम नहीं, याद बनाया; जुदाई को सिर्फ दूरी नहीं, एक एहसास बनाया और रोजमर्रा की छोटी-छोटी चीजों में भी ऐसी कहानियां खोजीं, जिनसे कई पीढ़ियां खुद को जोड़ पाती हैं।
शायद इसलिए गुलजार की शायरी का यह शेर आज भी उतना ही अपना लगता है –
“शाम से आँख में नमी सी है,
आज फिर आप की कमी सी है।”
18 अगस्त 1934 को अविभाजित भारत के झेलम जिले के दीना गांव में जन्मे संपूरन सिंह कालरा, जिन्हें दुनिया आज गुलजार के नाम से जानती है, 92 साल के हो गए हैं। उनकी जिंदगी सिर्फ फिल्मों और पुरस्कारों की कहानी नहीं है। यह बंटवारे का दर्द देखने वाले एक बच्चे की, दिल्ली में संघर्ष करने वाले युवक की, मुंबई के गैराज में काम करने वाले एक नौजवान की और फिर उसी नौजवान के शब्दों के जरिए हिंदी सिनेमा और उर्दू साहित्य पर गहरी छाप छोड़ने की कहानी है।
दीना से शुरू हुआ सफर
गुलजार का जन्म ऐसे समय हुआ जब भारत और पाकिस्तान की सीमाएं आज जैसी नहीं थीं। उनका बचपन दीना में बीता। उनके पिता माखन सिंह छोटे कारोबार से जुड़े थे। गुलजार की मां का निधन उनके बचपन में ही हो गया था। पढ़ाई में उनकी खास दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन साहित्य की ओर उनका झुकाव बचपन से था। रवींद्रनाथ टैगोर और शरतचंद्र जैसे लेखक उन्हें पसंद थे।
1947 में देश के बंटवारे ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी। परिवार को अपना घर छोड़कर भारत आना पड़ा। पहले अमृतसर और फिर दिल्ली में परिवार ने नया जीवन शुरू किया। दिल्ली के सब्जी मंडी इलाके में रहने के दौरान आर्थिक हालात आसान नहीं थे। गुलजार को काम भी करना पड़ा। बाद में यही संघर्ष उन्हें मुंबई ले गई, जहां उनकी जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय शुरू हुआ।
बंटवारे की यादें और विस्थापन का अनुभव बाद में उनकी रचनाओं में अलग-अलग रूपों में दिखाई देता रहा। गुलजार की लेखनी में याद, दूरी, घर, बिछड़ना और समय जैसे विषय बार-बार लौटते हैं। यही वजह है कि उनकी कविता सिर्फ प्रेम तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसमें इतिहास और इंसानी अनुभव की परतें भी दिखाई देती हैं।
मुंबई में गैराज की नौकरी और कविता का सपना
मुंबई पहुंचने के बाद गुलजार ने एक गैराज में काम किया। वह दुर्घटना में क्षतिग्रस्त कारों पर पेंट करने का काम करते थे। बाहर से यह काम उनकी साहित्यिक महत्वाकांक्षा से बिल्कुल अलग था, लेकिन उनके भीतर कविता लिखने की इच्छा लगातार बनी रही। इसी दौरान वे प्रगतिशील लेखक आंदोलन से जुड़े साहित्यिक लोगों के संपर्क में आए। यहीं से उनके लिए साहित्य और सिनेमा की दुनिया के दरवाजे धीरे-धीरे खुलने लगे।

उनकी मुलाकात गीतकार शैलेंद्र से हुई और इसी संपर्क ने उन्हें फिल्मी दुनिया तक पहुंचाया। उस समय निर्देशक बिमल रॉय की फिल्म ‘बंदिनी’ बन रही थी। संगीत एस.डी. बर्मन दे रहे थे और गीत लिखने की जिम्मेदारी शैलेंद्र की थी। परिस्थितियां बदलीं और गुलजार को फिल्म के लिए एक गीत लिखने का मौका मिला। इस तरह ‘मोरा गोरा अंग लाई ले’ उनके फिल्मी गीतकार करियर की शुरुआत बना। गीत को पसंद किया गया और गुलजार की प्रतिभा को पहली बड़ी पहचान मिली।
बिमल रॉय ने भी उनकी प्रतिभा को पहचाना। उन्होंने गुलजार को गैराज की नौकरी छोड़कर अपने साथ काम करने के लिए कहा। इसके बाद गुलजार उनके सहायक के रूप में फिल्म निर्माण को करीब से समझने लगे। यह अनुभव आगे चलकर उनके निर्देशक और पटकथा लेखक बनने में बेहद काम आया।
गीतकार से लेखक और निर्देशक तक का सफर
गुलजार ने सिर्फ गीत लिखने तक खुद को सीमित नहीं रखा। संवाद, पटकथा और कहानी लिखते हुए वे धीरे-धीरे निर्देशन की ओर भी बढ़े। उनकी पहली निर्देशित फिल्म ‘मेरे अपने’ थी। इसके बाद ‘कोशिश’, ‘अचानक’, ‘खुशबू’, ‘मौसम’, ‘आंधी’, ‘किनारा’, ‘किताब’, ‘अंगूर’, ‘नमकीन’, ‘मीरा’, ‘लेकिन…’ और ‘माचिस’ जैसी फिल्मों ने उन्हें एक अलग तरह के फिल्मकार के रूप में स्थापित किया।

गुलजार की फिल्मों में आमतौर पर रिश्तों की जटिलता, अकेलापन, यादें और इंसानी भावनाएं महत्वपूर्ण रही हैं। उनकी फिल्मों का संसार अक्सर बड़े घटनाक्रमों से ज्यादा लोगों के बीच की खामोशियों पर टिका होता है।
‘कोशिश’ में उन्होंने एक ऐसे दंपति की कहानी दिखाई जो सुन और बोल नहीं सकते, लेकिन उनके रिश्ते और संघर्ष को बेहद संवेदनशील तरीके से सामने रखा गया। ‘आंधी’ ने राजनीति और निजी रिश्तों के बीच तनाव को केंद्र में रखा, जबकि ‘अंगूर’ में हास्य और गलतफहमियों के जरिए कहानी कही गई। ‘माचिस’ में उन्होंने पंजाब के उग्रवाद के दौर की सामाजिक और राजनीतिक बेचैनी को पर्दे पर उतारा।
आर.डी. बर्मन से लेकर ए.आर. रहमान तक
गीतकार के रूप में गुलजार को समझे बिना हिंदी फिल्म संगीत की कहानी अधूरी लगती है। उन्होंने एस.डी. बर्मन, आर.डी. बर्मन, सलिल चौधरी, मदन मोहन, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जैसे संगीतकारों के साथ काम किया। बाद के दौर में विशाल भारद्वाज और ए.आर. रहमान के साथ भी उनकी शानदार साझेदारी बनी।

आर.डी. बर्मन के साथ उनका सहयोग खास तौर पर याद किया जाता है। ‘परिचय’, ‘आंधी’, ‘किनारा’, ‘खुशबू’ और ‘इजाजत’ जैसी फिल्मों के गीतों में दोनों की रचनात्मक साझेदारी दिखाई देती है।
‘मेरा कुछ सामान’ इसका बेहतरीन उदाहरण है। यहां सामान सिर्फ सामान नहीं है। कपड़े, कागज, बारिश और यादें एक टूटे रिश्ते की कहानी कहने लगती हैं। यही गुलजार की खासियत है। वह भावनाओं को सीधे बयान करने के बजाय उन्हें छोटी-छोटी तस्वीरों में बदल देते हैं।

उनके गीतों का दायरा भी बहुत बड़ा रहा है। ‘तेरे बिना जिंदगी से’, ‘तुझसे नाराज नहीं जिंदगी’, ‘दिल ढूंढता है’, ‘नाम गुम जाएगा’, ‘दो दीवाने शहर में’, ‘मेरा कुछ सामान’ जैसे गीतों में एक अलग तरह की संवेदनशीलता है। वहीं दूसरी ओर ‘बीड़ी जलाईले’, ‘कजरारे’ और ‘धन ते नान’ जैसे गीत दिखाते हैं कि गुलजार की भाषा सिर्फ गंभीर या उदास भावनाओं तक सीमित नहीं थी।
साहित्य की दुनिया में गुलजार
फिल्मों की लोकप्रियता के बावजूद गुलजार ने साहित्य को कभी पीछे नहीं छोड़ा। उनकी पहचान एक उर्दू कवि, कहानीकार, लेखक और अनुवादक के रूप में भी मजबूत रही है। उनकी कविताओं में आधुनिक जीवन, प्रेम, अकेलापन, समय और स्मृतियों की झलक मिलती है।
उन्होंने ‘चांद पुखराज का’, ‘रात पश्मीने की’ और ‘पंद्रह पांच पचहत्तर’ जैसे कविता संग्रह लिखे। उनकी कहानियां ‘रावी पार’ और ‘धुआं’ जैसे संग्रहों में प्रकाशित हुईं। भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की जानकारी के अनुसार, उन्होंने उर्दू कविता में ‘त्रिवेणी’ नाम की तीन पंक्तियों वाली एक विशेष शैली को भी लोकप्रिय बनाया।

साहित्य में उनके योगदान को 2002 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। साहित्य अकादमी के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, उन्हें उर्दू की पुस्तक ‘धुआं’ के लिए यह सम्मान मिला था।
2024 में गुलजार को 58वां ज्ञानपीठ पुरस्कार भी दिया गया। भारतीय ज्ञानपीठ की घोषणा के अनुसार, यह सम्मान उन्हें उर्दू साहित्य में उनके योगदान के लिए दिया गया था। इस सम्मान ने उनके साहित्यिक सफर को एक और बड़ी पहचान दी।
‘मिर्जा गालिब’ ने टीवी पर भी बनाई अलग पहचान
गुलजार की रचनात्मकता सिर्फ बड़े पर्दे तक नहीं रुकी। 1980 के दशक में उन्होंने दूरदर्शन के लिए ‘मिर्जा गालिब’ धारावाहिक बनाया। नसीरुद्दीन शाह ने इसमें गालिब की भूमिका निभाई। यह धारावाहिक आज भी भारतीय टेलीविजन के सबसे यादगार साहित्यिक रूपांतरणों में गिना जाता है।
उन्होंने दूरदर्शन के लिए ‘जंगल बुक’, ‘पोटली बाबा की’ और ‘हैलो जिंदगी’ जैसे कार्यक्रमों के लिए भी लेखन किया। बच्चों के लिए लिखने में भी उनकी खास दिलचस्पी रही। इसका सबसे लोकप्रिय उदाहरण ‘जंगल जंगल बात चली है’ है, जो बच्चों की कई पीढ़ियों की यादों का हिस्सा बन चुका है।
निजी जिंदगी में गुलजार
गुलजार ने 1973 में अभिनेत्री राखी से शादी की। दोनों की बेटी मेघना गुलजार बाद में फिल्म निर्देशक बनीं। मेघना ने अपने पिता के साहित्य और सिनेमा से मिले अनुभवों के बीच अपनी अलग पहचान बनाई और ‘तलवार’, ‘राजी’, ‘छपाक’ और ‘सैम बहादुर’ जैसी फिल्मों का निर्देशन किया।

गुलजार और राखी बाद में अलग-अलग रहने लगे, हालांकि दोनों का तलाक नहीं हुआ। गुलजार की निजी जिंदगी का यह हिस्सा भी उनकी रचनात्मक दुनिया से अलग नहीं रहा। रिश्तों, दूरी और अधूरेपन की भावनाएं उनके लेखन में बार-बार दिखाई देती हैं।
‘जय हो’ ने पहुंचाया ऑस्कर तक
गुलजार की लोकप्रियता भारत तक सीमित नहीं रही। 2008 की फिल्म ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ के गीत ‘जय हो’ ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। संगीत ए.आर. रहमान का था और गीत गुलजार ने लिखा था।
2009 में 81वें अकादमी पुरस्कार समारोह में ‘जय हो’ ने सर्वश्रेष्ठ मौलिक गीत का ऑस्कर जीता। आधिकारिक ऑस्कर रिकॉर्ड में गीत के संगीतकार के रूप में ए.आर. रहमान और गीतकार के रूप में गुलजार का नाम दर्ज है।

इसके अगले साल 2010 में इसी गीत को ग्रैमी पुरस्कार भी मिला। इस तरह गुलजार उन भारतीय रचनाकारों में शामिल हुए जिन्होंने साहित्य और फिल्म संगीत की अपनी पहचान को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया।
सम्मान की लंबी सूची
गुलजार को मिले सम्मान उनके लंबे रचनात्मक सफर की कहानी बताते हैं। 2002 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, 2004 में भारत सरकार का पद्म भूषण, 2009 में ऑस्कर, 2010 में ग्रैमी और 2013 में भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान दादासाहेब फाल्के पुरस्कार उन्हें मिला।
दादासाहेब फाल्के पुरस्कार के लिए भारत सरकार ने उन्हें गीतकार, निर्देशक, पटकथा लेखक, निर्माता और कवि के रूप में भारतीय सिनेमा में उनके लंबे योगदान के लिए चुना था।
इन पुरस्कारों की सूची 2024 में ज्ञानपीठ तक पहुंची। लेकिन गुलजार की लोकप्रियता को केवल पुरस्कारों से मापना मुश्किल है। उनका असली असर इस बात में दिखाई देता है कि उनके लिखे शब्द आज भी पुराने नहीं लगते।
92 की उम्र में भी क्यों प्रासंगिक हैं गुलजार?
गुलजार की सबसे बड़ी ताकत शायद यही है कि उन्होंने किसी एक दौर के लिए नहीं लिखा। उनकी कविता में वह व्यक्ति भी खुद को पाता है जिसने पहली बार प्यार किया है और वह भी जिसने किसी को खो दिया है। उनका गीत उस व्यक्ति के लिए भी है जो अकेले कमरे में बैठा है और उस व्यक्ति के लिए भी जो दोस्तों के साथ सफर पर निकला है।
आज उनकी पंक्तियां किताबों से निकलकर सोशल मीडिया पोस्ट, इंस्टाग्राम कैप्शन, रील्स और प्लेलिस्ट तक पहुंच चुकी हैं। आज उनके 92वें जन्मदिन पर भी नई पीढ़ी उनके गीतों और शेरों को उसी उत्साह से साझा कर रही है। हालिया जन्मदिन विशेष लेखों में भी उनकी सबसे बड़ी पहचान उनकी यही बहुमुखी प्रतिभा बताई गई है।
उनकी भाषा में उर्दू की नजाकत है, हिंदी की सहजता है और आम जिंदगी की वह गर्माहट है जो पाठक या श्रोता को तुरंत अपने करीब लगती है। शायद यही कारण है कि गुलजार की रचनाएं सिर्फ सुनी या पढ़ी नहीं जातीं, उन्हें महसूस किया जाता है।
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