NEET पेपर लीक केस में जल्द न्याय के लिए बनी फास्ट-ट्रैक कोर्ट की पहली सुनवाई ही स्थगित हो गई। CBI काउंसल की गैरमौजूदगी पर CJP ने सवाल उठाए। अब 3 अगस्त को मामले की सुनवाई होगी।
नई दिल्ली: NEET-UG परीक्षा में कथित पेपर लीक और अनियमितताओं को लेकर चल रहा विवाद अब एक बार फिर चर्चा में है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से पेपर लीक मामलों में तेजी से न्याय दिलाने के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाने की घोषणा के कुछ ही दिनों बाद, NEET पेपर लीक मामले की विशेष फास्ट-ट्रैक कोर्ट में पहली सुनवाई ही स्थगित हो गई।
रिपोर्ट के मुताबिक, सुनवाई के दौरान केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की ओर से कोई काउंसल पेश नहीं हुआ, जिसके बाद अदालत को कार्यवाही आगे बढ़ाए बिना अगली तारीख देनी पड़ी। अब मामले की सुनवाई 3 अगस्त को होने की बात सामने आई है।
घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 23 जुलाई को पेपर लीक के मामलों में त्वरित कार्रवाई और दोषियों को जल्द सजा दिलाने के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाने की घोषणा की थी। उन्होंने कहा था कि युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा।
लेकिन इसके कुछ दिनों के भीतर ही पहले मामले की सुनवाई स्थगित होने से विपक्ष और NEET आंदोलन से जुड़े लोगों को सरकार पर सवाल उठाने का मौका मिल गया है।
Cockroach Janta Party (CJP) से जुड़े नेता सौरव दास ने भी सोशल मीडिया पर इस घटनाक्रम को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा। उन्होंने फास्ट-ट्रैक कोर्ट की घोषणा और पहली सुनवाई के स्थगित होने के बीच के अंतर को लेकर सरकार की मंशा पर सवाल उठाए।
पहली सुनवाई के दिन आखिर हुआ क्या?
मीडिया रिपोर्टों की माने तो, NEET पेपर लीक मामले की पहली सुनवाई सोमवार (27 जुलाई) को विशेष रूप से नामित फास्ट-ट्रैक कोर्ट में होनी थी। यह सुनवाई ऐसे समय हुई जब केंद्र सरकार ने हाल ही में परीक्षा पेपर लीक मामलों के त्वरित निपटारे की दिशा में फास्ट-ट्रैक अदालतों की घोषणा की थी।
हालांकि, सुनवाई के दौरान CBI की ओर से काउंसल की अनुपस्थिति के कारण कार्यवाही आगे नहीं बढ़ सकी। बचाव पक्ष के वकीलों की ओर से समय मांगे जाने के बाद अदालत ने मामले को 3 अगस्त तक स्थगित कर दिया।
यह मामला इसलिए सुर्खियों में है क्योंकि सरकार ने जिस फास्ट-ट्रैक व्यवस्था को पेपर लीक मामलों में तेजी से न्याय दिलाने के लिए महत्वपूर्ण कदम बताया था, उसकी पहली ही सुनवाई टल चुकी है।
PM मोदी ने की थी फास्ट-ट्रैक कोर्ट की घोषणा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 23 जुलाई को पेपर लीक मामलों को लेकर फास्ट-ट्रैक कोर्ट गठित करने की घोषणा की थी। PM मोदी ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो जारी करते हुए कहा कि पेपर लीक में शामिल लोगों को जल्द से जल्द कठोर सजा दिलाने के लिए मामलों का त्वरित निपटारा जरूरी है।
पीएम मोदी ने उस संदेश में कहा था कि “युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा।”
सरकार की इस घोषणा को NEET विवाद के बीच एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और प्रशासनिक कदम के तौर पर देखा गया। खासतौर पर इसलिए क्योंकि देशभर में छात्रों और अभिभावकों के बीच परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता को लेकर चिंता बढ़ रही थी।
फास्ट-ट्रैक कोर्ट का मूल उद्देश्य यह है कि पेपर लीक और परीक्षा में अनुचित साधनों से जुड़े मामलों की सुनवाई सामान्य मामलों की तुलना में तेजी से हो और दोष साबित होने पर अपराधियों को जल्द सजा मिल सके।
CJP ने उठाए सवाल
NEET पेपर लीक मामले की विशेष फास्ट-ट्रैक कोर्ट में पहली ही सुनवाई स्थगित हो जाने पर CJP नेता सौरव दास ने सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उनके वीडियो पर किए गए वादे को याद दिलाते हुए गंभीर सवाल उठाए हैं।
उनका तर्क है कि जिस व्यवस्था को सरकार ने छात्रों को जल्द न्याय दिलाने के लिए बनाया है, अगर उसकी शुरुआत ही सुनवाई स्थगित होने से होती है तो इससे छात्रों के बीच निराशा पैदा हो सकती है।
CJP की ओर से लगातार यह सवाल उठाया जाता रहा है कि केवल कानून और अदालत की घोषणा करने से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि जांच और अभियोजन की प्रक्रिया प्रभावी तरीके से आगे बढ़े।
NEET विवाद से CJP आंदोलन तक कैसे पहुंची बात?
NEET-UG से जुड़े कथित पेपर लीक और परीक्षा प्रक्रिया में अनियमितताओं को लेकर छात्रों के बीच लंबे समय से असंतोष है। इस मुद्दे ने धीरे-धीरे एक बड़े छात्र आंदोलन का रूप ले लिया और CJP इसके प्रमुख संगठित चेहरों में से एक बनकर सामने आया।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन, भूख हड़ताल और देश के अलग-अलग हिस्सों में विरोध प्रदर्शनों के कारण यह मामला राष्ट्रीय राजनीति में भी चर्चा का विषय बना।
CJP की प्रमुख मांगों में परीक्षा व्यवस्था में जवाबदेही तय करना, कथित पेपर लीक की निष्पक्ष जांच और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई शामिल रही है। आंदोलन के दौरान संगठन ने तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की राजनीतिक जवाबदेही का मुद्दा भी उठाया।
CJP के प्रतिनिधियों और सरकार के बीच बातचीत के दौर भी हुए। रिपोर्टों के मुताबिक, संगठन की ओर से शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के अलावा प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई वापस लेने और प्रभावित परिवारों के लिए मुआवजे जैसे मुद्दे भी उठाए गए थे।
सरकार की ओर से परीक्षा प्रणाली में सुधार, पेपर लीक के खिलाफ कड़े प्रावधान और फास्ट-ट्रैक कोर्ट जैसे कदमों की घोषणा की गई। लेकिन आंदोलनकारी इन कदमों को पर्याप्त नहीं मानते रहे।
यही कारण है कि फास्ट-ट्रैक कोर्ट की पहली सुनवाई का स्थगित होना CJP के लिए सरकार पर दबाव बढ़ाने का एक और मुद्दा बन गया है।
सरकार ने अब तक क्या कदम उठाए हैं?
NEET विवाद के बीच केंद्र सरकार ने परीक्षा प्रणाली को मजबूत करने और पेपर लीक जैसी घटनाओं पर कार्रवाई के लिए कई कदमों की घोषणा की है।
सबसे प्रमुख कदमों में पेपर लीक मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट की घोषणा शामिल है। प्रधानमंत्री मोदी ने 23 जुलाई को इस संबंध में स्पष्ट रूप से कहा था कि दोषियों को जल्द और कड़ी सजा दिलाने के लिए त्वरित न्यायिक प्रक्रिया अपनाई जाएगी।
इसके बाद 24 जुलाई को प्रधानमंत्री ने एक वीडियो संदेश में परीक्षा पेपर लीक को गंभीर समस्या बताते हुए कड़े कानून की दिशा में आगे बढ़ने की बात कही। उन्होंने कहा कि पेपर लीक से लाखों छात्रों और उनके परिवारों को परेशानी होती है।
इसके अलावा, 27 जुलाई को सरकार की ओर से परीक्षा में अनुचित साधनों को रोकने से जुड़े कानून में संशोधन के लिए एक विधेयक लोकसभा में पेश किए जाने की रिपोर्ट सामने आई। प्रस्तावित बदलावों में जांच के लिए विशेष व्यवस्था और मामलों के तेजी से निपटारे के लिए विशेष फास्ट-ट्रैक अदालतों की व्यवस्था का उल्लेख किया गया। हालांकि, विधेयक पर चर्चा उसी दिन आगे नहीं बढ़ सकी।
इससे यह संकेत मिलता है कि सरकार ने पेपर लीक को लेकर कानूनी और संस्थागत स्तर पर कदम उठाने की दिशा में पहल की है। लेकिन इन कदमों का वास्तविक प्रभाव तभी दिखाई देगा, जब जांच पूरी होगी, दोषियों की पहचान होगी और अदालतों में मामलों का समयबद्ध निपटारा होगा।
BJP ने CJP से क्या वादे किए और कितने पूरे हुए?
CJP के साथ बातचीत के दौरान संगठन की ओर से प्रमुख मांगों में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे, प्रदर्शनकारियों पर दर्ज मामलों को वापस लेने और कथित रूप से प्रभावित छात्रों एवं परिवारों के लिए सहायता जैसे मुद्दे शामिल रहे।
इनमें से कुछ मुद्दों पर सरकार की ओर से कदम उठाए जाने का दावा किया गया है, जबकि कुछ मांगें अभी भी विवादित हैं।
उदाहरण के लिए, बिहार सरकार ने 27 जुलाई को NEET विरोध प्रदर्शनों से जुड़े मामलों में कार्रवाई नहीं करने और कुछ FIR तथा शिकायतें वापस लेने की घोषणा की। रिपोर्टों के अनुसार, यह आश्वासन उन लोगों के संबंध में था जिन्होंने 26 जुलाई शाम 6 बजे तक विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लिया था।
लेकिन यह कदम केंद्र सरकार द्वारा CJP के साथ किए गए किसी व्यापक राष्ट्रीय समझौते के बराबर नहीं माना जा सकता। इसी तरह, फास्ट-ट्रैक कोर्ट की घोषणा को भी CJP की मांगों की पूर्ण स्वीकृति कहना सही नहीं होगा।
फास्ट-ट्रैक कोर्ट से छात्रों को मिलेगा न्याय?
फास्ट-ट्रैक कोर्ट का उद्देश्य सामान्य न्यायिक प्रक्रिया को खत्म करना नहीं, बल्कि मामलों की सुनवाई को प्राथमिकता देकर तेजी से पूरा करना है। लेकिन अदालतों को कानूनी प्रक्रिया का पालन करना ही होता है। अभियोजन और बचाव दोनों पक्षों को अपनी बात रखने का अधिकार होता है।
इसलिए किसी मामले में पहली सुनवाई स्थगित होने का अर्थ यह नहीं है कि पूरा मुकदमा वर्षों तक चलेगा। हालांकि, अगर लगातार तारीखें बढ़ती रहती हैं या जांच और अभियोजन में देरी होती है, तो फास्ट-ट्रैक व्यवस्था का उद्देश्य प्रभावित हो सकता है।
NEET जैसे मामलों में इसका महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि इसके केंद्र में लाखों छात्रों का भविष्य है। परीक्षा प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं से प्रभावित छात्रों को केवल कानूनी कार्रवाई की जानकारी नहीं चाहिए, बल्कि उन्हें यह भरोसा भी चाहिए कि व्यवस्था निष्पक्ष और पारदर्शी है।
अब सबकी नजर 3 अगस्त की अगली सुनवाई पर है। उस दिन यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि CBI की ओर से काउंसल अदालत में उपस्थित होता है या नहीं और मामले की कानूनी कार्यवाही किस दिशा में आगे बढ़ती है।
साथ ही, सरकार द्वारा प्रस्तावित नए कानूनी प्रावधानों और फास्ट-ट्रैक कोर्ट की वास्तविक कार्यप्रणाली पर भी नजर रहेगी।
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