बैरन द्वीप पर 1787 से ज्वालामुखीय गतिविधियों का रिकॉर्ड मिलता है। 1991, 1994-95 और 2005-07 में यहां महत्वपूर्ण विस्फोट हुए थे। सितंबर 2025 और जनवरी 2026 की गतिविधियों का भी उल्लेख है।
महासमुंद/ पोर्ट ब्लेयर: भारत की ऐतिहासिक और प्राकृतिक विरासत को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) की विश्व धरोहर की अस्थायी सूची (Tentative List) में भारत के तीन नए स्थलों को शामिल किया गया है। इनमें छत्तीसगढ़ का सिरपुर और अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह के दो प्राकृतिक स्थल शामिल हैं।
इन तीनों स्थलों की खासियत यह है कि ये भारत की विरासत के अलग-अलग पहलुओं को सामने लाते हैं। सिरपुर प्राचीन धार्मिक परंपराओं, वास्तुकला और व्यापारिक गतिविधियों का प्रमाण है, जबकि अंडमान के दोनों स्थल पृथ्वी की भूगर्भीय प्रक्रियाओं, ज्वालामुखीय गतिविधियों और विशिष्ट जैव विविधता के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं।
क्या है यूनेस्को की अस्थायी सूची?
UNESCO की Tentative List उन सांस्कृतिक और प्राकृतिक स्थलों की सूची होती है, जिन्हें कोई देश भविष्य में विश्व धरोहर का दर्जा दिलाने के लिए नामांकित करने पर विचार कर सकता है। किसी स्थल को विश्व धरोहर सूची में शामिल करने की प्रक्रिया में यह शुरुआती लेकिन अनिवार्य चरण है।
इस सूची में शामिल होने का अर्थ यह नहीं है कि संबंधित स्थल को विश्व धरोहर का अंतिम दर्जा मिल गया है। इसके बाद संबंधित देश को नामांकन की प्रक्रिया आगे बढ़ानी होती है।
इसमें स्थल के ऐतिहासिक या प्राकृतिक महत्व, संरक्षण की स्थिति, प्रबंधन व्यवस्था और उसकी वैश्विक विशिष्टता से जुड़े दस्तावेज तैयार करना शामिल है। इसके बाद विशेषज्ञ संस्थाएं मूल्यांकन करती हैं और अंतिम निर्णय यूनेस्को की विश्व धरोहर समिति लेती है।
ऐसे में सिरपुर और अंडमान के स्थलों का अस्थायी सूची में शामिल होना उनके संभावित वैश्विक महत्व को सामने लाता है, लेकिन इन्हें अंतिम मान्यता मिलने के लिए आगे की प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
छत्तीसगढ़ का सिरपुर क्यों है खास?
छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में महानदी के पूर्वी तट पर स्थित सिरपुर भारत के महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों में से एक है। यह रायपुर से लगभग 78 किलोमीटर दूर है। प्राचीन समय में इसे श्रीपुर के नाम से जाना जाता था। यूनेस्को के विवरण के अनुसार, यह क्षेत्र दक्षिण कोसल के ऐतिहासिक राजनीतिक, धार्मिक और व्यापारिक जीवन का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यहां पांचवीं से बारहवीं शताब्दी के बीच निर्मित अनेक संरचनाओं के अवशेष मिलते हैं।
सिरपुर की सबसे बड़ी विशेषता यहां हिंदू, बौद्ध और जैन परंपराओं से जुड़े पुरातात्विक अवशेषों का एक साथ मिलना है। यहां मंदिरों, बौद्ध विहारों, आवासीय संरचनाओं, शिक्षा केंद्रों और बाजारों के अवशेष मिले हैं। ये संरचनाएं बताती हैं कि सिरपुर केवल धार्मिक गतिविधियों का केंद्र नहीं था, बल्कि यहां व्यापार और शहरी जीवन का भी विकास हुआ था।
लक्ष्मण मंदिर और प्राचीन वास्तुकला
सिरपुर का लक्ष्मण मंदिर यहां के सबसे प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्मारकों में शामिल है। ईंटों से निर्मित यह मंदिर अपनी स्थापत्य शैली और प्रवेश द्वार पर की गई बारीक नक्काशी के लिए जाना जाता है। यहां राम मंदिर और गंधेश्वर मंदिर जैसे धार्मिक स्थल भी मौजूद हैं।
यूनेस्को की अस्थायी सूची में प्रस्तुत विवरण में आनंदप्रभु कुटी विहार और स्वस्तिक विहार जैसे बौद्ध स्थलों के साथ बाजार परिसर और राजमहल परिसर का भी उल्लेख किया गया है। इन संरचनाओं के अवशेष सिरपुर के धार्मिक और सामाजिक जीवन के विभिन्न पहलुओं को समझने में मदद करते हैं।
अलग-अलग धार्मिक परंपराओं का केंद्र था सिरपुर
सिरपुर का महत्व इसलिए भी है क्योंकि यहां विभिन्न धार्मिक परंपराओं से जुड़ी संरचनाएं एक ही ऐतिहासिक परिदृश्य में मौजूद हैं। इससे प्राचीन भारत में धार्मिक गतिविधियों, शासकों के संरक्षण और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का अध्ययन करने में मदद मिलती है।
सिरपुर का विकास शरभपुरीय और पांडुवंशी राजवंशों के शासनकाल में हुआ। महानदी से इसकी निकटता भी इसके आर्थिक महत्व का एक कारण रही। यह नदी पूर्वी भारत में व्यापार और आवाजाही के लिए महत्वपूर्ण मार्ग थी। नदी के किनारे बसा होने के कारण सिरपुर का संबंध व्यापारिक गतिविधियों और क्षेत्रीय संपर्कों से रहा।
यूनेस्को के नामांकन विवरण में इस स्थल को पुरातात्विक, स्थापत्य, धार्मिक और व्यापारिक महत्व वाला एक बहुस्तरीय परिदृश्य बताया गया है। यहां की ऐतिहासिक संरचनाएं और प्राकृतिक भूगर्भीय विशेषताएं मिलकर इसे अन्य पुरातात्विक स्थलों से अलग बनाती हैं।
बाराटांग की चूना पत्थर की गुफाएं और मिट्टी के ज्वालामुखी भी सूची में शामिल
अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह का दूसरा प्रस्तावित स्थल बाराटांग द्वीप पर स्थित कार्स्ट-मड-वोल्केनो कॉम्प्लेक्स है। यह क्षेत्र चूना पत्थर की गुफाओं और मिट्टी के ज्वालामुखियों के लिए जाना जाता है। बाराटांग, अंडमान द्वीपसमूह की मुख्य शृंखला का हिस्सा है और श्री विजयपुरम से लगभग 100 किलोमीटर उत्तर में स्थित है।
यूनेस्को ने इस स्थल को प्राकृतिक धरोहर की श्रेणी में रखा है। इसके नामांकन में भूगर्भीय प्रक्रियाओं, गुफाओं के निर्माण, जैव विविधता और पृथ्वी के विकास के इतिहास को समझने में इसकी उपयोगिता पर जोर दिया गया है।
कैसे बनती हैं चूना पत्थर की गुफाएं?
बाराटांग की चूना पत्थर की गुफाएं लाखों वर्षों में विकसित हुई हैं। समुद्री जीवों के खोल, प्रवाल और अन्य जैविक अवशेषों के जमा होने से चूना पत्थर जैसी अवसादी चट्टानें बनती हैं। समय के साथ पानी इन चट्टानों को धीरे-धीरे घोलता है, जिससे दरारें, सुरंगें और गुफाएं विकसित होती हैं। इस तरह बने भू-आकृतिक परिदृश्य को कार्स्ट कहा जाता है।
इन गुफाओं के भीतर पानी में घुले खनिजों के जमाव से स्टैलेक्टाइट और स्टैलेग्माइट जैसी संरचनाएं भी बन सकती हैं। बाराटांग की गुफाओं का महत्व केवल पर्यटन तक सीमित नहीं है। इनसे भूगर्भीय इतिहास और पर्यावरण में लंबे समय के दौरान हुए बदलावों को समझने में मदद मिलती है।
यूनेस्को के दस्तावेज के अनुसार, महादेव गुफा से प्राप्त खनिज संरचनाओं का इस्तेमाल भारत में पिछले लगभग एक हजार वर्षों के मानसूनी बदलावों का अध्ययन करने के लिए भी किया गया है। इससे यह क्षेत्र वैज्ञानिक शोध के लिहाज से महत्वपूर्ण बनता है।
क्या होते हैं मिट्टी के ज्वालामुखी?
बाराटांग की दूसरी प्रमुख विशेषता यहां के मिट्टी के ज्वालामुखी हैं। सामान्य ज्वालामुखियों में मैग्मा और लावा बाहर निकलता है, जबकि मिट्टी के ज्वालामुखियों से मिट्टी, पानी और गैसों का मिश्रण सतह पर आता है। इस प्रक्रिया के पीछे भूमिगत दबाव और भूगर्भीय हलचल की भूमिका होती है।
स्थानीय स्तर पर इन संरचनाओं को ‘जलकी’ भी कहा जाता है। यूनेस्को के विवरण के अनुसार, बाराटांग में मिट्टी के ज्वालामुखियों के चार समूह हैं, जिनमें कई छोटे निकास बिंदु शामिल हैं। ये भूगर्भीय गतिविधियों और टेक्टोनिक प्रक्रियाओं के अध्ययन के लिए उपयोगी हैं।
इन ज्वालामुखियों में 2025 में लगभग 20 साल की निष्क्रियता के बाद फिर गतिविधि दर्ज की गई थी। यह क्षेत्र पृथ्वी की सतह के नीचे होने वाली प्रक्रियाओं और उनसे जुड़े पर्यावरणीय बदलावों को समझने के लिए महत्वपूर्ण माना गया है।
अंडमान सबडक्शन वोल्केनोज भी शामिल
तीसरा प्रस्तावित स्थल अंडमान सबडक्शन वोल्केनोज है। इसमें बैरन द्वीप और नारकोंडम द्वीप शामिल हैं। दोनों द्वीप ज्वालामुखीय गतिविधियों से बने हैं, लेकिन उनकी भूगर्भीय और पारिस्थितिक विशेषताएं अलग-अलग हैं।
यह क्षेत्र उस टेक्टोनिक सीमा के पास स्थित है जहां भारतीय प्लेट बर्मा माइक्रोप्लेट के नीचे धंस रही है। ऐसी प्रक्रिया को सबडक्शन कहा जाता है। इस भूगर्भीय गतिविधि ने अंडमान क्षेत्र की ज्वालामुखीय संरचनाओं और द्वीपों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यूनेस्को ने इस स्थल को प्राकृतिक धरोहर की श्रेणी में प्रस्तावित किया है।
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बैरन द्वीप पर भारत का सक्रिय ज्वालामुखी
बैरन द्वीप भारत का एकमात्र पुष्ट सक्रिय ज्वालामुखी वाला क्षेत्र है। यह अंडमान सागर में स्थित है और श्री विजयपुरम से लगभग 138 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में है। इस ज्वालामुखी का पहला दर्ज विस्फोट 1787 में हुआ था। इसके बाद अलग-अलग समय पर यहां ज्वालामुखीय गतिविधियां दर्ज की गईं।
यूनेस्को के नामांकन दस्तावेज के अनुसार, 1991, 1994-95 और 2005-07 में यहां महत्वपूर्ण विस्फोट हुए थे। इसके बाद भी समय-समय पर राख और गैस का उत्सर्जन दर्ज किया गया। सितंबर 2025 में हल्के विस्फोट और 10 जनवरी 2026 को राख का गुबार उठने की घटना का भी उल्लेख किया गया है।
बैरन द्वीप का महत्व केवल ज्वालामुखीय गतिविधि तक सीमित नहीं है। यहां वैज्ञानिकों को यह समझने का अवसर मिलता है कि विस्फोट के बाद लावा और राख से ढकी जमीन पर वनस्पति और जीव-जंतु किस तरह दोबारा विकसित होते हैं। यह प्राकृतिक पुनर्स्थापन की प्रक्रिया के अध्ययन के लिए उपयोगी क्षेत्र है।
नारकोंडम द्वीप और दुर्लभ हॉर्नबिल
नारकोंडम द्वीप बैरन द्वीप से अलग तरह का ज्वालामुखीय परिदृश्य प्रस्तुत करता है। यहां घने जंगल हैं और यह लंबे समय से अपेक्षाकृत अलग-थलग रहा है। इसी कारण यहां की जैव विविधता और पारिस्थितिक प्रक्रियाएं वैज्ञानिकों के लिए खास महत्व रखती हैं।
यह द्वीप नारकोंडम हॉर्नबिल का प्राकृतिक आवास है। यह पक्षी दुनिया में केवल इसी द्वीप पर पाया जाता है। इसके अलावा यहां नारकोंडम श्रू नाम का छोटा स्तनधारी जीव भी पाया जाता है, जिसे 2021 में दर्ज किए जाने का उल्लेख यूनेस्को के दस्तावेज में है।
नारकोंडम द्वीप पर पर्यटन की अनुमति नहीं है और यहां शोध अभियानों की संख्या भी सीमित रही है। इससे यहां की प्राकृतिक प्रक्रियाओं और स्थानीय प्रजातियों के अध्ययन का महत्व और बढ़ जाता है। वहीं बैरन द्वीप और नारकोंडम की अलग-अलग ज्वालामुखीय अवस्थाएं पृथ्वी की भूगर्भीय गतिविधियों और द्वीपीय पारिस्थितिकी के विकास को समझने का अवसर देती हैं।
भारत की विरासत के लिए इस फैसले के मायने
तीनों स्थलों का अस्थायी सूची में शामिल होना भारत की सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत की विविधता को रेखांकित करता है। सिरपुर प्राचीन भारत के धार्मिक सह-अस्तित्व, स्थापत्य कला और व्यापारिक इतिहास को सामने लाता है। वहीं बाराटांग की गुफाएं और मिट्टी के ज्वालामुखी तथा बैरन-नारकोंडम द्वीप भूगर्भीय इतिहास, ज्वालामुखीय गतिविधियों और जैव विविधता के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण हैं।
यूनेस्को की संभावित मान्यता इन स्थलों के संरक्षण, वैज्ञानिक शोध और जिम्मेदार पर्यटन की दिशा में अवसर पैदा कर सकती है। हालांकि, किसी भी विरासत स्थल के लिए अंतरराष्ट्रीय पहचान के साथ संरक्षण की जिम्मेदारी भी बढ़ती है। प्राकृतिक क्षेत्रों में अनियंत्रित पर्यटन से पर्यावरण को नुकसान पहुंच सकता है, जबकि पुरातात्विक स्थलों पर अव्यवस्थित निर्माण और संरक्षण की कमी ऐतिहासिक संरचनाओं को प्रभावित कर सकती है।
इसलिए आगे की प्रक्रिया में संरक्षण योजनाओं, प्रबंधन व्यवस्था, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और पर्यटन के प्रभावों पर ध्यान देना जरूरी होगा। विश्व धरोहर का दर्जा तभी सार्थक होगा, जब इन स्थलों की विशिष्टता आने वाली पीढ़ियों के लिए भी सुरक्षित रखी जा सके।
