Tuesday, 29 September 2026
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दिल्ली के शिल्प महोत्सव में दिखी ब्लैक पॉटरी की असली कहानी, आज़मगढ़ के कलाकारों की प्रस्तुति

तीन पीढ़ियों की साधना: प्रजापति परिवार ने सँभाली ब्लैक पॉटरी की विरासत

नई दिल्ली: विश्व-प्रसिद्ध ब्लैक पॉटरी की असली विरासत के वाहक कलाकार इन दिनों दिल्ली में हैं, जहाँ वे ITRHD के 12वें शिल्प महोत्सव में पारंपरिक और आधुनिक शिल्प का संगम प्रस्तुत कर रहे हैं। ये कलाकार उत्तर प्रदेश के निज़ामाबाद (आज़मगढ़) से आए हैं।

ब्लैक पॉटरी की इस विशिष्ट परंपरा की नींव स्वर्गीय राजेंद्र प्रसाद प्रजापति ने रखी थी, जिन्होंने इसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। उनके पुत्र शिवरतन प्रजापति ने इस विरासत को आगे बढ़ाया और आज तीसरी पीढ़ी के प्रतिनिधि अंकित प्रजापति इस कला को संरक्षित रखने के साथ-साथ उसे नए आयाम दे रहे हैं। दिल्ली में आयोजित इस 12वें शिल्प महोत्सव में अंकित प्रजापति अपने परिवार की उसी शिल्प परंपरा को समकालीन अभिव्यक्ति के साथ प्रस्तुत कर रहे हैं।

महोत्सव में ब्लैक पॉटरी के पारंपरिक बर्तनों के साथ-साथ कई विशिष्ट और दुर्लभ कलाकृतियाँ भी प्रदर्शित की जा रही हैं। इनमें मिट्टी की प्लेटों पर आयरन पेन से बनाए गए स्थायी रेखाचित्र, रामलला की मूर्तियाँ, राम मंदिर और काशी विश्वनाथ जैसे प्रमुख तीर्थ स्थलों पर आधारित कलाकृतियाँ शामिल हैं, जिन्हें एक बार बनाने के बाद मिटाया नहीं जा सकता। इसके अलावा ब्लैक पॉटरी से निर्मित महिलाओं के आभूषण, घड़ी स्टैंड, सजावटी और उपयोगी उत्पाद भी दर्शकों को विशेष रूप से आकर्षित कर रहे हैं।

इस अवसर पर अंकित प्रजापति ने भावुक होते हुए कहा,
“ब्लैक पॉटरी मेरे लिए सिर्फ एक कला नहीं, बल्कि मेरी पहचान, मेरा परिवार और मेरी पीढ़ियों की साधना है। जिस मिट्टी में मेरे दादा और पिता ने जीवन खपा दिया, उसी मिट्टी को आज देश-दुनिया के सामने प्रस्तुत करना मेरे लिए गर्व की बात है। दुख इस बात का है कि आज कई लोग खुद को ब्लैक पॉटरी का उद्धारक और संरक्षक बताने लगे हैं, जबकि सच्चाई यह है कि इस कला को आज तक जिंदा रखने का काम उन्हीं परिवारों ने किया है जो पीढ़ियों से इसे साधते आ रहे हैं। असली विरासत को छिपाकर झूठे दावे करना इस कला के साथ अन्याय है।”

उन्होंने आगे कहा कि उनका उद्देश्य किसी से टकराव नहीं, बल्कि सच्चाई को सामने लाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ जान सकें कि ब्लैक पॉटरी किन हाथों से जन्मी और किन संघर्षों के बल पर आज तक जीवित है।

यह प्रस्तुति केवल शिल्प प्रदर्शन तक सीमित नहीं है, बल्कि ब्लैक पॉटरी की उस पारंपरिक तकनीक को भी सामने लाती है, जिसमें बिना किसी रसायन या रंग के नियंत्रित ऑक्सीजन प्रक्रिया के माध्यम से प्राकृतिक काला रंग प्राप्त किया जाता है। यही तकनीक इसकी चमक, मजबूती और दीर्घकालिक पहचान को बनाए रखती है और इसे भारत की विशिष्ट सांस्कृतिक धरोहर का दर्जा दिलाती है।

दिल्ली में आयोजित यह 12वाँ शिल्प महोत्सव ब्लैक पॉटरी की असली विरासत को राष्ट्रीय मंच प्रदान कर रहा है। साथ ही यह संदेश भी देता है कि यदि पारंपरिक भारतीय कलाओं को सही पहचान, सम्मान और अवसर मिले, तो वे भारत से निकलकर विश्व पटल पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा सकती हैं। निज़ामाबाद (आज़मगढ़) के ये कलाकार इसी संकल्प के साथ ब्लैक पॉटरी को संरक्षित रखते हुए उसे देश-दुनिया तक पहुँचाने में निरंतर जुटे हुए हैं।

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BN

Bureau NOTD

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NOTD News के लिए नियमित रूप से समाचार लिखते हैं।

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