Wednesday, 19 August 2026
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₹99 और ₹999 वाली Pricing का राज, क्या सिर्फ ₹1 कम करने से बढ़ जाती है बिक्री?

क्या ₹999 की कीमत सच में बिक्री बढ़ाती है? रिसर्च में 99-ending prices के असर से लेकर कंपनियों की Psychological Pricing Strategy तक, जानिए इस एक रुपये के फर्क का पूरा खेल।

 नई दिल्ली: आपने कभी गौर किया है कि किसी चीज की कीमत अक्सर ₹100 की जगह ₹99, ₹500 की जगह ₹499 और ₹1,000 की जगह ₹999 क्यों लिखी होती है? मोबाइल, कपड़े, जूते, कॉस्मेटिक्स, ऑनलाइन सब्सक्रिप्शन से लेकर रोजमर्रा के कई सामानों में ऐसी कीमतें आम हैं। देखने में ₹999 और ₹1,000 के बीच सिर्फ ₹1 का फर्क है, लेकिन कंपनियां इस एक रुपये के अंतर को यूं ही नहीं छोड़तीं।

इसके पीछे सिर्फ ग्राहक को एक रुपया सस्ता सामान देना मकसद नहीं होता। 99 या 999 पर खत्म होने वाली कीमतें एक सोची-समझी Pricing Strategy का हिस्सा होती हैं, जिसे मार्केटिंग की भाषा में Psychological Pricing, Charm Pricing या Just-Below Pricing कहा जाता है।

19वीं सदी के आखिर तक 9 पर खत्म होने वाली कीमतों के इस्तेमाल के प्रमाण मिलते हैं। 1880 के एक Macy’s विज्ञापन में भी 9-Ending Prices दिखाई देती हैं। यानी यह तरीका आधुनिक ई-कॉमर्स कंपनियों की खोज नहीं है।

तो आखिर ₹999 लिखने से ₹1,000 की तुलना में ग्राहक की सोच कैसे बदल जाती है? क्या इसमें GST या दूसरे टैक्स का भी कोई खेल है? और क्या हर परिस्थिति में 99 वाली प्राइसिंग काम करती है? आइए समझते हैं पूरी कहानी।

₹999 की प्राइसिंग और दिमाग का खेल

मान लीजिए किसी वेबसाइट पर दो समान उत्पाद हैं। एक की कीमत ₹1,000 है और दूसरे की ₹999।

गणित कहता है कि दोनों के बीच सिर्फ ₹1 का अंतर है। यानी एक कीमत दूसरी से केवल 0.1 फीसदी कम है। लेकिन ग्राहक कीमत को हमेशा कैलकुलेटर की तरह नहीं देखता।

यहीं आता है लेफ्ट डिजिट इफेक्ट का जादू। हम किसी कीमत को आमतौर पर बाएं से दाएं पढ़ते हैं और कीमत का सबसे बायां अंक हमारे शुरुआती मूल्यांकन पर ज्यादा प्रभाव डाल सकता है। इसलिए ₹999 को देखकर दिमाग सबसे पहले 9 को पकड़ता है और कीमत को ₹900 वाली श्रेणी से जोड़ सकता है, जबकि ₹1,000 का पहला अंक 1 है और वह सीधे अगले हजार के स्तर में दिखाई देता है। इसी तरह $3.99 और $4.00 में वास्तविक अंतर सिर्फ एक सेंट है, लेकिन मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया अलग हो सकती है।

इसी कारण ₹499 की कीमत ग्राहक को ₹500 के मुकाबले कुछ अधिक आकर्षक लग सकती है।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हर व्यक्ति हर बार ₹999 को ₹900 समझ लेता है। ग्राहक की जानकारी, उत्पाद की कीमत, ब्रांड, खरीदारी की परिस्थिति और यह बात कि वह कीमतों की कितनी तुलना कर रहा है, इन सभी का असर पड़ता है।

99 की कीमत को क्या कहते हैं?

ऐसी प्राइसिंग को अलग-अलग नामों से जाना जाता है। Psychological Pricing इसका व्यापक नाम है। इसके तहत कीमत इस तरह तय की जाती है कि वह ग्राहक की धारणा और निर्णय लेने की प्रक्रिया को प्रभावित करे।

Charm pricing आमतौर पर ₹99, ₹499 या ₹999 जैसी कीमतों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसे Just-Below Pricing भी कहा जाता है, क्योंकि कीमत किसी round number से ठीक नीचे रखी जाती है।

इसकी शुरुआत किसने की?

यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। इंटरनेट पर 99-ending pricing की शुरुआत को लेकर कई कहानियां मिलती हैं। एक लोकप्रिय कहानी के मुताबिक, पुराने समय में दुकानदारों ने कीमतें ₹1 या $1 के बजाय 99 सेंट रखने शुरू कीं ताकि कर्मचारी को ग्राहक को बाकी पैसे लौटाने के लिए कैश रेजिस्टर खोलना पड़े और बिक्री दर्ज हो जाए। इससे कथित तौर पर कर्मचारी द्वारा बिक्री की रकम अपने पास रखने की संभावना कम होती।

यह कहानी काफी लोकप्रिय है, लेकिन इसे 99 प्राइसिंग का प्रमाणित और एकमात्र शुरुआत नहीं माना जा सकता। शोधकर्ताओं ने इसके शुरुआती इतिहास को लेकर अलग-अलग स्पष्टीकरण दिए हैं और किसी एक व्यक्ति को इसका आविष्कारक नहीं माना जाता।

इसके उलट, 1880 के Macy’s विज्ञापन में 9-ending prices का प्रमाण मिलता है। इससे कम से कम इतना स्पष्ट है कि 99 या 9 पर खत्म होने वाली कीमतें 20वीं सदी से पहले ही रीटेल में इस्तेमाल हो रही थीं।

क्या 99 वाली कीमत वास्तव में बिक्री बढ़ाती है?

इस सवाल पर गहरी शोध की गई है। 1996 में Robert M. Schindler और Thomas M. Kibarian ने महिलाओं के कपड़ों के एक रीटेलर के कैटलॉग पर 99-ending prices के प्रभाव का अध्ययन किया।

लगभग 90,000 कैटलॉग के प्रयोग में 99-ending prices वाले कैटलॉग ने राउंड नंबर कीमत वाले कैटलॉग की तुलना में 8 फीसदी अधिक बिक्री दर्ज की। इस प्रयोग में 99-ending कैटलॉग से अधिक लोगों ने खरीदारी की और खरीदारों द्वारा खर्च की गई राशि भी ज्यादा रही।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हर उत्पाद पर कीमत के आखिरी दो अंक 99 कर देने से बिक्री 8 फीसदी बढ़ जाएगी। कीमत का असर category, customer और context के हिसाब से बदलता है।

फिर ₹999 ही क्यों? ₹997 या ₹995 क्यों नहीं?

अगर पूरी कहानी सिर्फ “कम कीमत दिखाने” की होती तो कंपनियां हर जगह ₹997 या ₹993 भी लिख सकती थीं।

लेकिन 9-ending कीमत ग्राहक की उम्मीदों से भी जुड़ी हैं। ₹999, ₹499 और ₹99 जैसे price points retail में लंबे समय से दिखाई देते रहे हैं। इसलिए ग्राहक इन्हें देखकर तुरंत समझ लेता है कि यह एक रीटेल प्राइस है, जो किसी राउंड नंबर से थोड़ा नीचे रखी गई है।

इसी तरह कुछ कंपनियां ₹495, ₹995 या ₹1,495 जैसी कीमतों का भी इस्तेमाल करती हैं। यानी आखिरी अंक हमेशा 9 होना जरूरी नहीं है। 5 और दूसरे odd endings भी मनोवैज्ञानिक कीमतों में इस्तेमाल होते हैं।

क्या ₹999 और ₹1,000 में टैक्स का भी कोई खेल है?

यह हिस्सा खास तौर पर भारतीय ग्राहकों के लिए महत्वपूर्ण है।

कई बार लोग मान लेते हैं कि कंपनियां ₹999 इसलिए रखती हैं ताकि GST लगने के बाद कीमत ₹1,000 के आसपास पहुंचे। लेकिन यह 99 pricing का सामान्य या मुख्य कारण नहीं है।

भारत में Packaged Commodities के लिए Legal Metrology rules के तहत घोषित MRP को सामान्य तौर पर सभी टैक्स सहित माना जाता है। नियमों में retail sale price को maximum price बताया गया है और पैकेज पर MRP को “inclusive of all taxes” के रूप में घोषित किया जाता है।

GST के मामले में भी CBIC स्पष्ट करता है कि जहां retail sale price का संदर्भ है, वह GST सहित हो सकता है; हालांकि GST की गणना संबंधित transaction value और लागू tax provisions के अनुसार होती है।

इसका मतलब यह हुआ कि अगर किसी packaged product पर MRP ₹999 लिखी है, तो ग्राहक से उस MRP के ऊपर केवल इसलिए GST जोड़कर ₹1,000 या उससे ज्यादा लेना सही नहीं होगा क्योंकि GST अलग से लगना है।

क्या यह रणनीति हर बार काम करती है?

अगर ग्राहक किसी महंगे उत्पाद को खरीदने से पहले बहुत शोध कर रहा है, रिव्यू पढ़ रहा है, specifications compare कर रहा है और अलग-अलग वेबसाइट पर कीमत देख रहा है, तो ₹1 का फर्क उसके लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं हो सकता।

इसी तरह luxury products में बहुत ज्यादा चार्म प्राइसिंग हमेशा सही रणनीति नहीं होती। अगर कोई ब्रांड खुद को प्रीमियम दिखाना चाहता है तो राउंड प्राइस कई बार ज्यादा उपयुक्त हो सकती है।

उदाहरण के लिए ₹1,00,000 की कीमत किसी luxury product को premium impression दे सकती है, जबकि ₹99,999 उसे discount-oriented दिखा सकती है। इसलिए pricing strategy product और brand positioning पर निर्भर करती है।

क्या ग्राहक इस रणनीती में हमेशा फंस जाते हैं?

99 प्राइसिंग को सिर्फ “ग्राहक को बेवकूफ बनाने की चाल” कहना भी पूरी तरह सही नहीं होगा।

यह consumer psychology का फायदा उठाने वाली रणनीति जरूर है, लेकिन ग्राहक के पास प्रोडक्ट की कीमत, क्वालिटी और विकल्प की तुलना करने की क्षमता भी होती है।

इसके अलावा कई ग्राहक ₹999 और ₹1,000 के अंतर को पूरी तरह समझते हैं, लेकिन फिर भी ₹999 को visually और psychologically ज्यादा आकर्षक मान सकते हैं।

आज 99 Pricing सिर्फ दुकानों तक सीमित नहीं

पहले यह रणनीति मुख्य रूप से physical retail stores में दिखाई देती थी। अब इसका इस्तेमाल e-commerce websites, food delivery, subscriptions, software plans, fashion stores, electronics और digital services तक में होता है।

₹299, ₹499, ₹799, ₹999, ₹1,499 और ₹1,999 जैसे price points अब भारतीय बाजार में बेहद सामान्य हैं।

कई कंपनियां इसके साथ डिस्काउंट, crossed-out price और “limited offer” जैसे दूसरे psychological cues भी जोड़ती हैं।

उदाहरण के लिए ₹1,499 की कीमत काटकर ₹999 दिखाना ग्राहक के सामने सिर्फ अंतिम कीमत नहीं रखता, बल्कि उसे “ग्राहक ₹500 बचा रहे हैं” वाला reference point भी देता है।

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MD Faijan

लेखक

मोहम्मद फैजान न्यूज़ ऑफ द डे में पत्रकार हैं, जहाँ वे खेल, मनोरंजन, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों को कवर करते हैं। इससे पहले वे यूट्यूब चैनल स्पोर्ट्स यारी में सोशल मीडिया एग्जीक्यूटिव के रूप में कार्य कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने डिजिटल कंटेंट मैनेजमेंट और ऑडियंस एंगेजमेंट का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के कोरिया जिले से संबंध रखने वाले फैजान आधुनिक मीडिया कार्यप्रणालियों की अच्छी समझ रखते हैं और कहानी कहने के विभिन्न रूपों में गहरी रुचि रखते हैं।

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