Friday, 21 August 2026
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हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में पहली बार मनाई गई तुलसी जयंती , मोरारी बापू ने वैश्विक मंच पर 9 विद्वानों को सम्मानित किया

कैम्ब्रिज, मैसाचुसेट्स: गोस्वामी तुलसीदास जयंती के अवसर पर बुधवार को पहली बार तुलसी जयंती महोत्सव भारत के बाहर अमेरिका के हार्वर्ड यूनिवर्सिटी स्थित सैंडर्स थिएटर में आयोजित किया गया। यह आयोजन पूज्य मोरारी बापू की नौ दिवसीय रामकथा ‘मानस गुरु प्रसाद’ के अंतर्गत हुआ। इस ऐतिहासिक अवसर पर वर्ष 2010 से गुजरात के तलगाज़रडा में आयोजित किए जा रहे तुलसी, व्यास, वाल्मीकि और रत्नावली पुरस्कार भी पहली बार भारत से बाहर प्रदान किए गए।

मोरारी बापू द्वारा 16 वर्ष पहले शुरू की गई तुलसी जयंती की परंपरा का उद्देश्य उन विद्वानों, संतों, कथाकारों और सांस्कृतिक योगदानकर्ताओं को सम्मानित करना है, जिन्होंने रामचरितमानस, रामकथा और गोस्वामी तुलसीदास की साहित्यिक एवं आध्यात्मिक विरासत को संरक्षित करने, समझने और आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

हार्वर्ड में तुलसी जन्मोत्सव और ग्लोबल अवॉर्ड्स समारोह

19 अगस्त 2026 को आयोजित तुलसी जन्मोत्सव एवं ग्लोबल अवॉर्ड्स समारोह में नौ विशिष्ट विद्वानों, आध्यात्मिक नेताओं और सांस्कृतिक योगदानकर्ताओं को आठ प्रतिष्ठित पुरस्कार प्रदान किए गए। समारोह में संतों, शिक्षाविदों, विद्वानों, कथाकारों, संगीतकारों, कलाकारों और अकादमिक समुदाय के सदस्यों ने हिस्सा लिया।

वाल्मीकि पुरस्कार यूसी बर्कले के प्रो. सैली जे. सदरलैंड गोल्डमैन और प्रो. रॉबर्ट गोल्डमैन को संयुक्त रूप से प्रदान किया गया। यह पुरस्कार ओसाका यूनिवर्सिटी की प्रो. मडोका फुकुओका को भी दिया गया।

व्यास पुरस्कार कोलंबिया यूनिवर्सिटी के प्रो. जॉन स्ट्रैटन हॉले, अमेरिका स्थित विद्वान डॉ. अश्विन भाई कांतिलाल राजगोर और भारत की प्रसिद्ध आध्यात्मिक वक्ता देवी चित्रलेखा को प्रदान किया गया।

तुलसी पुरस्कार यूटी ऑस्टिन के प्रो. रूपर्ट स्नेल और सामुदायिक नेता पियूष भाई मेहता को दिया गया। वहीं, रत्नावली पुरस्कार हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की प्रो. डायना एल. एक को तुलनात्मक धर्म और भारत अध्ययन के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए प्रदान किया गया। हार्वर्ड में इस ऐतिहासिक आयोजन को संभव बनाने में उनका योगदान भी महत्वपूर्ण रहा।

रामचरितमानस की वैश्विक प्रासंगिकता पर जोर

पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं की विविध पृष्ठभूमि भारत के शास्त्रीय साहित्य और आध्यात्मिक परंपराओं के प्रति बढ़ती वैश्विक रुचि को दर्शाती है। हार्वर्ड में तुलसी जयंती का आयोजन रामायण और रामचरितमानस की वैश्विक प्रासंगिकता को रेखांकित करता है और भारतीय साहित्यिक परंपरा को अंतरराष्ट्रीय अकादमिक एवं सांस्कृतिक मंच से जोड़ता है।

इस अवसर पर मोरारी बापू ने कहा, “पत्रं पुष्पं फलं — जैसे परमात्मा के चरणों में हम कुछ समर्पित करते हैं, पुष्प भी उसी ने खिलाए हैं, पत्र भी उसी ने टहनियों को दिए हैं, फल भी उसी ने लगाए हैं। फिर भी हम वही लेकर उसी को समर्पित करते हैं। मैं अपने हृदय के विचार प्रस्तुत कर रहा हूँ।”

उन्होंने आगे कहा कि उन्हें इस बात की प्रसन्नता है कि देश की व्यास पीठों और रामकथा की परंपरा से जुड़े महान व्यक्तित्वों का सम्मान करने का अवसर मिला। बापू ने पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उनकी प्रतिक्रिया को वे केवल शब्दों से नहीं, बल्कि उनकी आंखों और हृदय की भावनाओं से समझते हैं।

‘सत्य, प्रेम और करुणा का सार्वभौमिक सन्देश

रामकथा के मुख्य आयोजक पावन पोपट ओबीई ने कहा कि मोरारी बापू की रामकथा के माध्यम से दिया जाने वाला सत्य, प्रेम और करुणा का संदेश सार्वभौमिक है। उन्होंने कहा कि स्वीकार, आनंद और प्रेम की यह अनुभूति भौगोलिक सीमाओं और संस्कृतियों से परे है।

उन्होंने कहा कि तुलसी जन्मोत्सव और इसके प्रतिष्ठित पुरस्कारों को हार्वर्ड तक लाना इसी वैश्विक यात्रा का स्वाभाविक विस्तार है। उनके अनुसार, यह आयोजन रामचरितमानस की कालातीत ज्ञान परंपरा को ऐसे अंतरराष्ट्रीय दर्शकों तक पहुंचा रहा है, जो इसके मूल्यों और आदर्शों में बढ़ती रुचि रखते हैं।

2010 से जारी तुलसी जयंती पुरस्कार की परंपरा

मोरारी बापू ने वर्ष 2010 में तुलसी जयंती कार्यक्रम की शुरुआत उन लोगों को सम्मानित करने के उद्देश्य से की थी, जिन्होंने अपना जीवन रामकथा और रामचरितमानस की परंपरा के संरक्षण, व्याख्या और प्रसार के लिए समर्पित किया है। इसके बाद हर वर्ष गुजरात के तलगाज़रडा में तुलसी जन्मोत्सव के अवसर पर संतों, विद्वानों, कथाकारों और अन्य विशिष्ट योगदानकर्ताओं को सम्मानित किया जाता रहा है।

वर्ष 2026 में यह परंपरा पहली बार अमेरिका पहुंची और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में तुलसी जन्मोत्सव के आयोजन के साथ इसे वैश्विक मंच मिला।

छह दशकों से रामकथा का वैश्विक प्रसार कर रहे हैं मोरारी बापू

मोरारी बापू रामायण के प्रसिद्ध व्याख्याता हैं और पिछले छह दशकों से दुनिया भर में रामकथा का वाचन कर रहे हैं। उनकी कथाओं का केंद्र धर्मग्रंथ होते हैं, लेकिन वे विभिन्न धर्मों और आध्यात्मिक परंपराओं के उदाहरणों के माध्यम से शांति, सत्य, प्रेम और करुणा का संदेश देते हैं। वे विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोगों को रामकथा से जुड़ने के लिए आमंत्रित करते हैं।

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस के वाचन की उनकी यात्रा 14 वर्ष की उम्र में शुरू हुई थी, जब उन्होंने ग्रामीण क्षेत्र में तीन लोगों के सामने कथा कही थी। आज उनकी रामकथा भारत के अलावा श्रीलंका, इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका, केन्या, यूनाइटेड किंगडम, अमेरिका, ब्राज़ील, ऑस्ट्रेलिया, इज़राइल और जापान सहित दुनिया के कई देशों तक पहुंच चुकी है।

मोरारी बापू ने समाज के विभिन्न वर्गों और हाशिए पर रहने वाले समुदायों के लिए भी रामकथा का आयोजन किया है। इनमें सेक्स वर्कर्स और ट्रांसजेंडर समुदाय सहित कई सामाजिक समूह शामिल हैं। इसके अलावा, वे भारत और विदेशों में आपदा प्रभावित क्षेत्रों में राहत एवं सहायता के कार्यों से भी जुड़े रहे हैं, जिनमें युद्धग्रस्त यूक्रेन भी शामिल है।

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में तुलसी जयंती का यह आयोजन तुलसीदास की साहित्यिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत के वैश्विक विस्तार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यह आयोजन रामचरितमानस की कथा, काव्य और आध्यात्मिक चिंतन को नए अंतरराष्ट्रीय दर्शकों तक पहुंचाते हुए इस परंपरा की मूल भावना को कायम रखता है।

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BN

Bureau NOTD

लेखक

NOTD News के लिए नियमित रूप से समाचार लिखते हैं।

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