तस्लीमा नसरीन 19 साल बाद कोलकाता लौटी हैं। जानिए ‘लज्जा’ की लेखिका को 2007 में शहर क्यों छोड़ना पड़ा था और अब उनकी वापसी क्यों चर्चा में है।
कोलकाता: बांग्लादेश की चर्चित लेखिका और मानवाधिकार कार्यकर्ता तस्लीमा नसरीन करीब 19 साल के लंबे अंतराल के बाद एक बार फिर कोलकाता लौट आई हैं। वह शहर, जिसे उन्होंने कभी अपने लिए दूसरे घर की तरह देखा था, 2007 में उन्हें छोड़ना पड़ा था।
उनकी वापसी केवल एक साहित्यकार के किसी शहर में लौटने की कहानी नहीं है, बल्कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धार्मिक कट्टरता, राजनीतिक दबाव और निर्वासन के बीच एक लेखिका के लंबे संघर्ष की भी कहानी है।
तस्लीमा नसरीन शुक्रवार (31 जुलाई) को कोलकाता पहुंचीं। वे 1 अगस्त को शहर के रवींद्र सदन में आयोजित एक साहित्यिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम में हिस्सा लेने वाली हैं। इस कार्यक्रम में उनके कविता पाठ, चर्चा और सम्मान समारोह का हिस्सा बनने की जानकारी सामने आई है।
कार्यक्रम को धर्मनिरपेक्ष और कट्टरवाद-विरोधी संगठनों से जुड़े समूहों ने आयोजित किया है। उनकी वापसी ऐसे समय में हो रही है जब पश्चिम बंगाल की राजनीति में भी इसे लेकर बहस तेज है।
कौन हैं तस्लीमा नसरीन?
तस्लीमा नसरीन का जन्म 1962 में तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान और आज के बांग्लादेश के मयमनसिंह में हुआ था। उन्होंने चिकित्सा की पढ़ाई की और डॉक्टर के रूप में भी काम किया, लेकिन उनकी पहचान जल्द ही साहित्य और लेखन की दुनिया में बनी। उनकी रचनाओं में महिलाओं की स्थिति, पितृसत्ता, धर्म, सामाजिक असमानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे विषय प्रमुख रहे।
तस्लीमा ने अपने लेखन के जरिए उन सामाजिक और धार्मिक रूढ़ियों पर सवाल उठाए, जिन्हें वह महिलाओं की स्वतंत्रता और अधिकारों के रास्ते में बाधा मानती थीं। यही बेबाकी उनके लेखन की सबसे बड़ी ताकत बनी, लेकिन इसी वजह से उन्हें भारी विरोध और धमकियों का भी सामना करना पड़ा।
उनका उपन्यास ‘लज्जा’ 1993 में प्रकाशित हुआ। यह किताब बांग्लादेश में एक हिंदू परिवार की कहानी के माध्यम से धार्मिक कट्टरता और अल्पसंख्यकों की स्थिति पर सवाल उठाती है। किताब को लेकर बांग्लादेश में विवाद हुआ और इसके बाद तस्लीमा पर कट्टरपंथी समूहों का विरोध बढ़ गया। उनके खिलाफ धार्मिक भावनाएं आहत करने के आरोप भी लगाए गए और उन्हें देश छोड़ना पड़ा।
1994 में बांग्लादेश से निकलने के बाद तस्लीमा ने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा निर्वासन में बिताया। उन्होंने यूरोप के कई देशों में समय बिताया और बाद में भारत में रहने लगीं। उनके लिए भारत केवल एक सुरक्षित जगह नहीं था, बल्कि बंगाली भाषा और संस्कृति के कारण भावनात्मक रूप से भी महत्वपूर्ण था।
कोलकाता से उनका रिश्ता
तस्लीमा नसरीन के लिए कोलकाता का महत्व सिर्फ इसलिए नहीं था कि यह पश्चिम बंगाल की राजधानी है। उनके लिए यह शहर बंगाली भाषा और संस्कृति की उस दुनिया का हिस्सा था, जिससे वह बचपन से जुड़ी रही थीं।
बांग्लादेश छोड़ने के बाद जब उन्होंने कोलकाता में रहना शुरू किया, तो उन्हें लगा कि वह अपनी भाषाई और सांस्कृतिक जड़ों के करीब लौट आई हैं। उन्होंने कई मौकों पर कहा कि कोलकाता में उन्हें अपनेपन का एहसास होता था। यही कारण है कि 2007 में शहर छोड़ने के बाद भी उनके मन में वापस लौटने की इच्छा बनी रही।
मई 2026 में दिए गए एक बयान में उन्होंने कहा था कि वह लंबे समय से कोलकाता लौटना चाहती थीं और उम्मीद जताई थी कि बदले राजनीतिक माहौल में उनकी वापसी संभव हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा था कि बांग्लादेश से निकलने के बाद कोलकाता उनके लिए घर जैसा बन गया था और वह शहर की सांस्कृतिक दुनिया से दोबारा जुड़ना चाहती हैं।
2007 में आखिर क्यों छोड़ना पड़ा था कोलकाता?
तस्लीमा नसरीन के कोलकाता छोड़ने के पीछे सबसे बड़ा कारण उनकी आत्मकथात्मक पुस्तक ‘द्विखंडित’ को लेकर हुआ विवाद था। यह पुस्तक उनके आत्मकथात्मक लेखन का हिस्सा थी और इसमें उनके निजी जीवन के साथ-साथ धर्म, समाज और राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियों पर उनके विचार शामिल थे।
पुस्तक के कुछ हिस्सों को लेकर मुस्लिम संगठनों और धार्मिक समूहों ने विरोध किया। नवंबर 2007 में कोलकाता में विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गए और कानून-व्यवस्था की स्थिति को लेकर चिंता पैदा हुई। उस समय पश्चिम बंगाल में बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार सत्ता में थी।
सरकार ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए तस्लीमा को कोलकाता से बाहर भेज दिया। इसके बाद वह पहले राजस्थान और फिर दिल्ली चली गईं। बाद के वर्षों में भी उनकी कोलकाता वापसी की इच्छा सामने आती रही, लेकिन उन्हें शहर में लौटने की अनुमति या राजनीतिक समर्थन नहीं मिला।
इस घटना को लेकर आज भी अलग-अलग राजनीतिक और वैचारिक व्याख्याएं मौजूद हैं। कुछ लोग मानते हैं कि सरकार ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए उन्हें हटाया, जबकि आलोचकों का कहना है कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सामने राजनीतिक दबाव के झुकने का उदाहरण था।
19 साल बाद क्यों लौटी हैं तस्लीमा नसरीन?
तस्लीमा नसरीन की मौजूदा कोलकाता यात्रा किसी स्थायी वापसी की आधिकारिक घोषणा नहीं है। वह एक विशेष साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए शहर आई हैं।
1 अगस्त को रवींद्र सदन में होने वाले कार्यक्रम में उनके कविता पाठ और साहित्यिक चर्चा का कार्यक्रम है। आयोजन से जुड़े संगठनों ने इसे धर्मनिरपेक्षता, मानवाधिकार और धार्मिक कट्टरवाद के खिलाफ आवाज को मजबूती देने वाले कार्यक्रम के तौर पर पेश किया है।
उनकी वापसी को संभव बनाने में बदले राजनीतिक माहौल की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 2007 के बाद पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा सरकार चली गई, तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आई और अब 2026 में राज्य की राजनीति में बीजेपी के रूप में एक नया बदलाव देखने को मिला है। इसी बदले राजनीतिक संदर्भ में तस्लीमा की वापसी को लेकर चर्चा हो रही है।
हालांकि तस्लीमा ने यह स्पष्ट किया है कि उनकी यात्रा को किसी राजनीतिक दल से जोड़ना सही नहीं है। उन्होंने उन आरोपों को खारिज किया है कि उनकी कोलकाता वापसी किसी पार्टी विशेष के समर्थन या निमंत्रण पर हो रही है। उनके अनुसार, उन्हें कार्यक्रम के आयोजकों ने आमंत्रित किया है और उनकी यात्रा को राजनीतिक रंग देना उचित नहीं है।
कोलकाता पहुंचकर क्या बोलीं तस्लीमा?
कोलकाता पहुंचने के बाद तस्लीमा नसरीन ने शहर के प्रति अपने भावनात्मक लगाव को जाहिर किया। उन्होंने कहा कि इतने लंबे समय बाद कोलकाता लौटना उनके लिए भावुक कर देने वाला अनुभव है। उन्होंने शहर को अपनेपन और घर जैसा एहसास देने के लिए धन्यवाद दिया।
उनकी वापसी से जुड़े बयानों में ‘होमकमिंग’ यानी घर वापसी की भावना सबसे प्रमुख रही। लगभग दो दशक तक शहर से दूर रहने के बाद भी उनके लिए कोलकाता की पहचान एक ऐसे स्थान की रही, जहां उन्होंने बंगाली भाषा और संस्कृति के साथ गहरा जुड़ाव महसूस किया था।
उनकी वापसी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। तस्लीमा लंबे समय से यह कहती रही हैं कि किसी भी लेखक को अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार होना चाहिए, भले ही वे विचार लोकप्रिय न हों या विवाद पैदा करें।
उनके आलोचक हालांकि उनके लेखन के कुछ हिस्सों को धार्मिक भावनाओं के प्रति असम्मानजनक मानते रहे हैं। यही विरोधाभास उनके पूरे सार्वजनिक जीवन की पहचान बन चुका है।
क्या तस्लीमा की वापसी किसी बड़े बदलाव का संकेत है?
19 साल बाद तस्लीमा नसरीन का कोलकाता लौटना कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है। व्यक्तिगत स्तर पर यह उस लेखिका की घर वापसी है, जिसने लंबे समय तक उस शहर से दूर रहकर भी उसे अपना माना।
साहित्यिक स्तर पर यह एक ऐसे लेखक की वापसी है, जिसकी किताबों और विचारों ने दशकों से दक्षिण एशिया में धर्म, महिलाओं के अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बहस को प्रभावित किया है।
राजनीतिक स्तर पर यह वापसी पश्चिम बंगाल के बदलते राजनीतिक परिदृश्य की ओर भी इशारा करती है। जिस लेखिका को 2007 में सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की परिस्थितियों के कारण शहर से बाहर भेजा गया था, उनका करीब दो दशक बाद उसी शहर में सार्वजनिक कार्यक्रम में शामिल होना निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण बदलाव है।
हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि उनकी वापसी से उनके स्थायी रूप से कोलकाता में रहने के रास्ते खुले हैं। उनकी मौजूदा यात्रा एक विशेष कार्यक्रम से जुड़ी है। फिर भी, यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि वह पहली बार 2007 के बाद सार्वजनिक रूप से कोलकाता के साहित्यिक मंच पर दिखाई देने जा रही हैं।
उनकी वापसी इस सवाल को भी फिर से सामने लाती है कि लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा क्या होनी चाहिए और क्या किसी लेखक के विवादित विचारों के कारण उसे सार्वजनिक जीवन या सांस्कृतिक मंचों से दूर किया जाना चाहिए।
इस ‘घर वापसी‘ के क्या मायने
तस्लीमा नसरीन की कोलकाता वापसी को केवल एक साहित्यिक कार्यक्रम के तौर पर देखना शायद इस पूरे घटनाक्रम को छोटा करके देखने जैसा होगा। यह उस महिला की कहानी का नया अध्याय है, जिसने अपने लेखन के कारण अपना देश छोड़ा, निर्वासन झेला, धमकियों का सामना किया और फिर भी लिखना नहीं छोड़ा।
करीब 19 साल बाद जब वह कोलकाता पहुंची हैं, तो उनके लिए यह सिर्फ एक शहर की यात्रा नहीं है। यह उस शहर से दोबारा मिलने का मौका है, जिसे उन्होंने कभी अपना घर माना था और जहां से उन्हें परिस्थितियों के कारण जाना पड़ा था।
उनकी वापसी यह भी याद दिलाती है कि साहित्य और राजनीति का रिश्ता अक्सर बेहद जटिल होता है। एक लेखक के शब्द समाज में बहस पैदा कर सकते हैं, सत्ता को असहज कर सकते हैं और कभी-कभी सुरक्षा तथा कानून-व्यवस्था की चुनौती भी बन सकते हैं। लेकिन इसी के साथ यह सवाल भी हमेशा बना रहेगा कि असहमति और विवाद के बीच लोकतांत्रिक समाज किस तरह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करता है।
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