हैदराबाद स्थित जनस्वास्थ्य संस्थान ने सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यबल, डिजिटल हेल्थ क्षमता और ‘वन हेल्थ’ मॉडल को मजबूत करने के लिए दीर्घकालिक निवेश पर दिया जोर
हैदराबाद: हाल के वर्षों में भारत ने स्वास्थ्य क्षेत्र को मजबूत करने के लिए उल्लेखनीय निवेश किया है। हालांकि, भविष्य में संभावित स्वास्थ्य आपात स्थितियों से समय रहते प्रभावी ढंग से निपटने के लिए पर्याप्त संख्या में प्रशिक्षित सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की उपलब्धता अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
यह बात PHFI इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक हेल्थ साइंसेज (डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी) के कार्यवाहक कुलपति डॉ. एम. विष्णु वर्धन राव ने अपने लेख “इंडियाज़ नेक्स्ट हेल्थ क्राइसिस: इट इज़ नॉट अ डिज़ीज़, इट इज़ अ वर्कफोर्स गैप” में कही है।
डॉ. राव ने लेख में लिखा है कि भारत ने अस्पतालों और स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत बनाने में बड़ा निवेश किया है, लेकिन देश में आज भी ऐसे प्रशिक्षित विशेषज्ञों की भारी कमी है जो सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थितियों को रोकने, उनका प्रबंधन करने और समय पर प्रभावी कार्रवाई करने में सक्षम हों।
कोविड-19 महामारी का उल्लेख करते हुए डॉ. राव लिखते हैं कि भारत ने कम समय में अस्पतालों और क्रिटिकल केयर सुविधाओं का तेजी से विस्तार किया, लेकिन महामारी के दौरान एपिडेमियोलॉजिस्ट, सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रबंधकों, डेटा वैज्ञानिकों और सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को जुटाना एक बड़ी चुनौती साबित हुआ। उन्होंने लिखा है कि ऐसे कुशल कार्यबल को तैयार करने के लिए वर्षों तक लगातार निवेश और मजबूत संस्थागत सहयोग की जरूरत होती है।
डॉ. राव ने लेख में लिखा है कि इस वर्ष भारत का स्वास्थ्य बजट 1.06 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गया है, जो स्वास्थ्य क्षेत्र को मजबूत करने की सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। हालांकि, उनका कहना है कि केवल अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्र बनाना ही पर्याप्त नहीं है। बेहतर नतीजे तभी मिलेंगे, जब प्रशिक्षित सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी उपलब्ध हों। ये विशेषज्ञ लोगों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने की योजनाएं बनाते हैं, स्वास्थ्य से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण करते हैं, बीमारियों के फैलाव पर नजर रखते हैं और स्वास्थ्य तंत्र को लोगों से जोड़ने का काम करते हैं।
लेख में बताया गया है कि भारत में इस समय लगभग 45,000 योग्य सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की कमी है। साथ ही, सार्वजनिक स्वास्थ्य शिक्षा का विस्तार चिकित्सा शिक्षा की तेज़ी से हुई वृद्धि के अनुरूप नहीं हो पाया है। डॉ. राव लिखते हैं कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का उद्देश्य केवल बीमारी का इलाज करना नहीं है। इसका मकसद बीमारियों को फैलने से रोकना, टीकाकरण की बेहतर रणनीति तैयार करना, बीमारियों पर नजर रखने की व्यवस्था विकसित करना और ऐसी नीतियां बनाना है, जिनसे हर व्यक्ति तक गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं पहुंच सकें।
लेख में ‘वन हेल्थ’ (One Health) दृष्टिकोण के बढ़ते महत्व पर भी जोर दिया गया है। यह अवधारणा मानव, पशु और पर्यावरण के स्वास्थ्य को एक-दूसरे से जुड़ा हुआ मानती है। डॉ. राव लिखते हैं कि कोविड-19 महामारी ने दिखा दिया कि नई और उभरती बीमारियां पर्यावरण में होने वाले बदलावों से जुड़ी होती हैं। इसलिए इनसे प्रभावी ढंग से निपटने के लिए कई क्षेत्रों के विशेषज्ञों को मिलकर काम करना होगा।
डॉ. राव ने आगे लिखा है कि डिजिटल हेल्थ तकनीकों, इलेक्ट्रॉनिक हेल्थ रिकॉर्ड, टेलीमेडिसिन प्लेटफॉर्म और वियरेबल उपकरणों के बढ़ते उपयोग के कारण ऐसे विशेषज्ञों की मांग तेजी से बढ़ रही है, जो स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण कर उन्हें नीति निर्माण और बीमारियों की निगरानी में प्रभावी ढंग से इस्तेमाल कर सकें।
लेख में डॉ. राव ने विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा सार्वजनिक स्वास्थ्य कैडर विकसित करने की पहल और सार्वजनिक स्वास्थ्य शिक्षा तथा नीति निर्माण को मजबूत करने के लिए की जा रही साझेदारियों का स्वागत किया है। उन्होंने लिखा है कि ये सकारात्मक कदम हैं, लेकिन स्थायी बदलाव तभी संभव होगा, जब इनके लिए लंबे समय तक लगातार निवेश किया जाए।
लेख के अंत में डॉ. राव लिखते हैं, “कोविड-19 महामारी ने हमें एक महंगा सबक दिया कि मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के अभाव की कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है। अब हमारे सामने सवाल यह है कि क्या हम इसे केवल एक बार की आपदा मानकर भूल जाएंगे, या इसे एक स्थायी सीख के रूप में स्वीकार कर भविष्य के लिए अधिक मजबूत और लचीली स्वास्थ्य व्यवस्था तैयार करेंगे।”
