दिल्ली की राजनीति में चार दशक तक सक्रिय रहे पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार का 80 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। 1984 दंगा मामलों ने उनके लंबे राजनीतिक करियर को विवादों में घेर दिया था।
नई दिल्ली: दिल्ली की राजनीति में कभी बेहद प्रभावशाली माने जाने वाले पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार का 80 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े मामलों में उम्रकैद की सजा काट रहे कुमार को गुरुवार को तिहाड़ जेल से दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। उनके निधन की पुष्टि अस्पताल से जुड़े सूत्रों और अधिकारियों ने की है। फिलहाल उनकी मौत का आधिकारिक कारण स्पष्ट नहीं किया गया है।
सज्जन कुमार का राजनीतिक जीवन करीब चार दशक लंबा रहा। एक समय वह दिल्ली कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में गिने जाते थे और बाहरी दिल्ली लोकसभा क्षेत्र से तीन बार सांसद चुने गए। लेकिन 31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में भड़की हिंसा ने उनके राजनीतिक जीवन पर ऐसा दाग लगाया, जो आखिर तक उनका पीछा करता रहा।
वर्षों तक चली जांच, गवाहियों और कानूनी लड़ाई के बाद 2018 में दिल्ली हाई कोर्ट ने उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई। 2025 में उन्हें 1984 से जुड़े एक अन्य हत्या मामले में भी दूसरी उम्रकैद मिली।
कौन थे सज्जन कुमार?
सज्जन कुमार का जन्म 23 सितंबर 1945 को दिल्ली में हुआ था। संसद के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार उनके पिता का नाम रघुनाथ सिंह और मां का नाम मी कौर था। उन्होंने मैट्रिक तक शिक्षा हासिल की थी। राजनीति में आने से पहले वह कारोबार से जुड़े थे और सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय थे।
दिल्ली की राजनीति में उनका प्रवेश 1970 के दशक में हुआ। 1977 में वह दिल्ली नगर निगम के पार्षद चुने गए और इसके बाद दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महासचिव भी बने। उस दौर में वह संजय गांधी के करीबी नेताओं में गिने जाते थे। धीरे-धीरे दिल्ली की राजनीति में उनका प्रभाव बढ़ता गया और ग्रामीण तथा पुनर्वास कॉलोनियों वाले इलाकों में उनका मजबूत जनाधार तैयार हुआ।
35 साल की उम्र में बने सांसद
सज्जन कुमार ने 1980 में पहली बार लोकसभा चुनाव जीता। उन्होंने बाहरी दिल्ली लोकसभा सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा और संसद पहुंचे। उस समय उनकी उम्र करीब 35 वर्ष थी। यह उनके राजनीतिक करियर का बड़ा मोड़ था।
वह 1980 में सातवीं लोकसभा के लिए चुने गए। इसके बाद 1991 में उन्होंने फिर बाहरी दिल्ली से जीत दर्ज की। 2004 में उन्होंने एक बार फिर इसी सीट पर शानदार वापसी की। संसद के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार वह 2004 में 14वीं लोकसभा के सदस्य बने और शहरी विकास तथा सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना से जुड़ी समितियों में भी रहे।
2004 का चुनाव उनके राजनीतिक करियर की सबसे बड़ी जीतों में से एक माना जाता है। उन्होंने बाहरी दिल्ली से 8.55 लाख से अधिक वोट हासिल किए और बीजेपी के दिग्गज नेता साहिब सिंह वर्मा को बड़े अंतर से हराया। उस समय उनकी जीत ने यह दिखाया था कि 1984 के आरोपों के बावजूद दिल्ली के कुछ इलाकों में उनका राजनीतिक प्रभाव अब भी बरकरार था।
1984 के दंगों ने बदल दी राजनीतिक कहानी
सज्जन कुमार के जीवन का सबसे विवादित और निर्णायक अध्याय 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़ा है।
31 अक्टूबर 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके सिख अंगरक्षकों द्वारा हत्या के बाद दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में सिख समुदाय के खिलाफ हिंसा भड़क उठी। दिल्ली में बड़ी संख्या में लोगों की हत्या हुई और घरों, दुकानों तथा धार्मिक स्थलों को निशाना बनाया गया।
सज्जन कुमार पर आरोप लगा कि उन्होंने दिल्ली के विभिन्न इलाकों में भीड़ को भड़काने और हिंसा में भूमिका निभाने में मदद की। उनके खिलाफ कई गवाहों ने बयान दिए। हालांकि शुरुआती वर्षों में इन मामलों में उन्हें कानूनी राहत मिलती रही और कई मुकदमों का परिणाम उनके पक्ष में आया।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि 1984 की हिंसा के बाद लंबे समय तक पीड़ित परिवार न्याय की प्रतीक्षा करते रहे। जांच और मुकदमों की धीमी प्रक्रिया को लेकर लगातार सवाल उठते रहे।
2013 में मिली बड़ी राहत
1984 से जुड़े एक प्रमुख मामले में निचली अदालत ने 2013 में सज्जन कुमार को बरी कर दिया था। इसी मामले में अन्य आरोपियों को दोषी ठहराया गया था। कुमार के खिलाफ CBI ने अपील की और मामला दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचा।
कई वर्षों तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद दिसंबर 2018 में स्थिति पूरी तरह बदल गई।
2018 में दिल्ली हाई कोर्ट ने सुनाई उम्रकैद
17 दिसंबर 2018 को दिल्ली हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए सज्जन कुमार को दोषी ठहराया और उम्रकैद की सजा सुनाई। यह मामला दिल्ली कैंट के राज नगर इलाके में एक सिख परिवार के पांच सदस्यों की हत्या और एक गुरुद्वारे को जलाए जाने से जुड़ा था।
हाई कोर्ट की पीठ ने मामले में आपराधिक साजिश, हत्या, दंगा भड़काने और अन्य गंभीर आरोपों के तहत कुमार को दोषी माना। अदालत ने इस मामले को 1984 की हिंसा के संदर्भ में बेहद गंभीर माना था।
इस फैसले के बाद सज्जन कुमार ने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। दिसंबर 2018 में उनका सक्रिय राजनीतिक जीवन लगभग समाप्त हो गया और उन्होंने जेल में अपनी सजा काटनी शुरू की।
2025 में दूसरी उम्रकैद
सज्जन कुमार की कानूनी मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं। फरवरी 2025 में दिल्ली की एक अदालत ने सज्जन कुमार को 1984 के एक अन्य हत्या मामले में दोषी ठहराया। यह मामला सरस्वती विहार इलाके में 1 नवंबर 1984 को जसवंत सिंह और उनके बेटे तरुणदीप सिंह की हत्या से जुड़ा था।
अदालत ने 12 फरवरी 2025 को उन्हें हत्या समेत कई आरोपों में दोषी पाया और 25 फरवरी को उम्रकैद की सजा सुनाई। अभियोजन पक्ष ने मौत की सजा की मांग की थी, लेकिन अदालत ने उनकी उम्र, स्वास्थ्य और अन्य परिस्थितियों को देखते हुए उम्रकैद का फैसला दिया।
इस तरह सज्जन कुमार को 1984 से जुड़े दो अलग-अलग मामलों में उम्रकैद की सजा मिली और वह तिहाड़ जेल में बंद रहे।
2026 में एक मामले में बरी भी हुए
सज्जन कुमार के कानूनी सफर का एक दूसरा पहलू यह भी रहा कि सभी मामलों में उन्हें दोषी नहीं ठहराया गया।
जनवरी 2026 में दिल्ली की एक अदालत ने उन्हें जनकपुरी और विकासपुरी में 1984 की हिंसा से जुड़े एक मामले में बरी कर दिया। इस मामले में उन पर हिंसा भड़काने और अन्य अपराधों के आरोप थे। अदालत ने उन्हें इस मामले में दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त आधार नहीं पाया। हालांकि, दूसरे मामलों में मिली उम्रकैद की सजा के कारण वह जेल से बाहर नहीं आ सके।
इस फैसले के बाद 1984 दंगा पीड़ित परिवारों ने निराशा जताई थी। कई पीड़ितों ने कहा था कि वे चार दशक से न्याय का इंतजार कर रहे हैं।
जेल में रहते हुए शुरु हुई स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां
पिछले कुछ वर्षों में सज्जन कुमार की उम्र और स्वास्थ्य भी उनके कानूनी मामलों में चर्चा का विषय रहे। उन्होंने चिकित्सा आधार पर जमानत और राहत के लिए अदालतों का रुख किया था। 2025 के मामले में भी अदालत ने सजा तय करते समय उनकी उम्र और स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियों को ध्यान में रखा था।
20 अगस्त को उनकी तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें तिहाड़ जेल से सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया। अस्पताल में डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। हालांकि, उनकी मौत का सटीक चिकित्सकीय कारण अभी आधिकारिक तौर पर सामने नहीं आया है। इसलिए किसी विशेष बीमारी या स्वास्थ्य समस्या को उनकी मौत की वजह बताना फिलहाल जल्दबाजी होगी।
निजी जिंदगी और परिवार
संसद के आधिकारिक रिकॉर्ड में सज्जन कुमार की वैवाहिक स्थिति विवाहित दर्ज है। उनकी पत्नी का नाम राम कौर है। आधिकारिक प्रोफाइल के अनुसार उनके एक बेटे और दो बेटियां हैं।
उनके परिवार के कुछ सदस्य भी राजनीति से जुड़े रहे। उनके भाई रमेश कुमार भी कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय रहे और दक्षिण दिल्ली से लोकसभा सांसद रहे। 2013 में उनके बेटे प्रवेश कुमार ने भी दिल्ली विधानसभा चुनाव लड़ा था, हालांकि वह चुनाव नहीं जीत सके।
कांग्रेस से चार दशक पुराना रिश्ता कैसे टूटा?
सज्जन कुमार का कांग्रेस के साथ लंबा राजनीतिक रिश्ता था। 1977 में दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महासचिव बनने से लेकर कई बार सांसद बनने तक उन्होंने पार्टी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
लेकिन 2018 की सजा के बाद उनके लिए पार्टी में बने रहना संभव नहीं रहा। उन्होंने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। इसके साथ ही दिल्ली कांग्रेस की राजनीति में उनका प्रभाव भी समाप्त हो गया।
उनका राजनीतिक सफर इस मायने में असाधारण रहा कि 1984 के आरोपों के बावजूद वह दोबारा राष्ट्रीय राजनीति में लौटे, 1991 में लोकसभा पहुंचे और 2004 में भी बड़ी जीत हासिल की। लेकिन 2018 की अदालत की सजा ने उनके राजनीतिक जीवन का दूसरा अध्याय लिख दिया।
गुरुवार, 20 अगस्त को 80 वर्ष की उम्र में उनकी मृत्यु के साथ उनका व्यक्तिगत और राजनीतिक सफर समाप्त हो गया। मगर 1984 की हिंसा से जुड़े सवाल, पीड़ित परिवारों की स्मृतियां और न्याय की लंबी प्रक्रिया आज भी भारतीय लोकतंत्र के सामने एक गंभीर ऐतिहासिक अध्याय के रूप में मौजूद हैं।
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