Sunday, 11 October 2026
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संसदीय समिति ने भारत के वर्चुअल डिजिटल एसेट्स क्षेत्र के लिए नई दिशा के संकेत दिए

नई दिल्ली: पिछले सप्ताह वित्त संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने प्रस्तावित सिक्योरिटीज मार्केट कोड विधेयक, 2025 पर अपनी 36वीं रिपोर्ट जारी की। इस प्रस्तावित कोड का उद्देश्य भारत के सिक्योरिटीज मार्केट को नियंत्रित करने वाले तीन प्रमुख मौजूदा कानूनों की जगह एक एकीकृत कानूनी ढांचा तैयार करना है।

हालांकि समिति की रिपोर्ट मुख्य रूप से भारत के सिक्योरिटीज कानूनों में सुधारों पर केंद्रित है, लेकिन इसकी एक सिफारिश वर्चुअल डिजिटल एसेट्स क्षेत्र के लिए अलग से ध्यान आकर्षित करती है। समिति ने सुझाव दिया है कि जब तक इस क्षेत्र के लिए एक अलग और स्पष्ट कानूनी ढांचा तैयार नहीं हो जाता, तब तक एक तय नियामक की निगरानी में स्व-नियामक संगठन (एसआरओ) स्थापित किया जाना चाहिए।

यह सिफारिश समिति द्वारा सामूहिक निवेश योजनाओं की समीक्षा के दौरान सामने आई। समिति ने एक अहम सवाल उठाया कि क्या निवेश योजना की परिभाषा वर्चुअल डिजिटल एसेट्स से जुड़ी व्यवस्थाओं पर भी लागू हो सकती है।

आज पारंपरिक सिक्योरिटीज, जैसे किसी कंपनी के शेयर या बॉन्ड, को डिजिटल टोकन के रूप में भी पेश किया जा सकता है। इन टोकनों में निवेश से जुड़ी व्यवस्थाएं कई मामलों में पारंपरिक निवेश योजनाओं जैसी हो सकती हैं। उदाहरण के तौर पर, इनमें कई निवेशकों से पैसा इकट्ठा किया जा सकता है।

हालांकि, टोकन के रूप में मौजूद संपत्तियों या वितरित लेखा तकनीक (डिस्ट्रिब्यूटेड लेजर टेक्नोलॉजी) के जरिए चलने वाली ऐसी निवेश व्यवस्थाओं की कानूनी स्थिति अब तक स्पष्ट नहीं रही है। समिति ने इसी अस्पष्टता को दूर करने की जरूरत पर ध्यान दिया है।

समिति के सवालों के जवाब में वित्त मंत्रालय ने कहा कि फिलहाल वर्चुअल डिजिटल एसेट्स को केवल धन शोधन रोधी और कर कानूनों के तहत नियंत्रित किया जाता है। किसी वर्चुअल डिजिटल एसेट से जुड़ी व्यवस्था को सिक्योरिटीज मार्केट कोड के तहत निवेश योजना माना जाएगा या नहीं, यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगा कि उस व्यवस्था में निवेश योजना की परिभाषित विशेषताएं मौजूद हैं या नहीं।

मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रस्तावित कोड में सिक्योरिटीज की परिभाषा तकनीक से प्रभावित नहीं होती। इसका मतलब है कि किसी संपत्ति की कानूनी पहचान केवल इस आधार पर नहीं बदलेगी कि उसे किस तकनीक के जरिए पेश या संचालित किया जा रहा है।

यानी अगर कोई मूल संपत्ति कानून के अनुसार सिक्योरिटी नहीं है, तो उसका डिजिटल रूप केवल नई तकनीक के इस्तेमाल के कारण सिक्योरिटी नहीं बन जाएगा। ऐसे में वह सिर्फ डिजिटल रूप में होने की वजह से सिक्योरिटीज मार्केट कोड के दायरे में नहीं आएगा।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि दूसरे देशों में सिक्योरिटीज और वर्चुअल डिजिटल एसेट्स को किस तरह नियंत्रित किया जा रहा है। अमेरिका, ब्रिटेन, सिंगापुर और यूरोपीय संघ जैसे क्षेत्रों में किसी संपत्ति की कानूनी स्थिति तय करते समय केवल उसके पीछे इस्तेमाल की गई तकनीक को नहीं देखा जाता। इसके बजाय यह देखा जाता है कि वह संपत्ति किस तरह काम करती है और उसकी प्रकृति क्या है।

सरल शब्दों में, अगर कोई संपत्ति सिक्योरिटी जैसी विशेषताएं रखती है और उसी तरह काम करती है, तो उसे सिक्योरिटी के रूप में नियंत्रित किया जा सकता है। साथ ही, इन देशों और क्षेत्रों में उन डिजिटल संपत्तियों के लिए अलग नियम और कानूनी ढांचे भी विकसित किए जा रहे हैं, जो पारंपरिक वित्तीय कानूनों के दायरे में नहीं आतीं।

समिति ने यह भी माना कि भारत में वर्चुअल डिजिटल एसेट्स से जुड़ी गतिविधियां अभी भी नियमों की स्पष्टता के अभाव में चल रही हैं। जैसे-जैसे इस क्षेत्र में गतिविधियां और निवेशकों की भागीदारी बढ़ रही है, वैसे-वैसे कारोबार करने वालों, नियामकों और सबसे महत्वपूर्ण रूप से निवेशकों के सामने अनिश्चितता भी बढ़ रही है।

इसी पृष्ठभूमि में समिति ने सुझाव दिया कि जब तक इस क्षेत्र के लिए एक समर्पित कानूनी ढांचा तैयार नहीं हो जाता, तब तक एक तय नियामक की निगरानी में स्व-नियामक संगठन स्थापित किया जाए।

यह सिफारिश इस बात को स्वीकार करती है कि वर्चुअल डिजिटल एसेट्स के लिए एक व्यापक कानूनी ढांचा तैयार करने में अभी समय लग सकता है। इस बीच, उद्योग-आधारित संस्था जैसे स्व-नियामक संगठन कुछ बुनियादी मानक तय कर सकती है।

इन मानकों में बेहतर संचालन व्यवस्था, पारदर्शिता, निवेशकों की सुरक्षा और तय आचार संहिता का पालन शामिल हो सकता है। ऐसा तंत्र किसी वैधानिक नियामक की निगरानी में काम करते हुए इस क्षेत्र में जिम्मेदार तरीके से कारोबार करने को बढ़ावा दे सकता है और नियमों के पालन को भी मजबूत कर सकता है।

समिति की इन सिफारिशों से आम निवेशकों के लिए फिलहाल कोई तत्काल बदलाव नहीं होगा, क्योंकि ये सुझाव सलाहकारी प्रकृति के हैं और अभी कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं हैं। हालांकि, ये इस बात का मजबूत संकेत जरूर देते हैं कि भविष्य में भारत की नीति वर्चुअल डिजिटल एसेट्स क्षेत्र को लेकर किस दिशा में आगे बढ़ सकती है।

वर्चुअल डिजिटल एसेट्स क्षेत्र में निवेशकों की बढ़ती भागीदारी को देखते हुए केवल कर और धन शोधन रोधी कानून बाजार के व्यवहार और उपभोक्ता सुरक्षा से जुड़े सभी मुद्दों को संभालने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकते।

समिति की सिफारिश इस बात की बढ़ती स्वीकार्यता को दर्शाती है कि भारत का वर्चुअल डिजिटल एसेट्स क्षेत्र अब उस स्तर पर पहुंच रहा है, जहां संस्थागत शासन-व्यवस्था की जरूरत लगातार बढ़ती जा रही है।

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BN

Bureau NOTD

लेखक

NOTD News के लिए नियमित रूप से समाचार लिखते हैं।

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