Friday, 21 August 2026
ब्रेकिंग न्यूज़
India Sugar Price Hike: चीनी के दाम में रिकॉर्ड उछाल से बढ़ी चिंता, ड्यूटी-फ्री इंपोर्ट से E20 तक समझिए पूरी कहानी Delhi-Bihar TB Cases: स्क्रीनिंग में सामने आए 99 हजार से ज्यादा टीबी के मामले, जानिए क्यों बढ़ी चिंता ENG vs PAK: रूट ने सचिन के 68 टेस्ट अर्धशतकों के रिकॉर्ड की बराबरी की, पाकिस्तान पर इंग्लैंड की 195 रन की बढ़त Judicial Service Practice Rule: सुप्रीम कोर्ट ने 3 साल की प्रैक्टिस की शर्त घटाकर की 1 साल, चयन के बाद 2 साल की ट्रेनिंग और क्लर्कशिप अनिवार्य हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में पहली बार मनाई गई तुलसी जयंती , मोरारी बापू ने वैश्विक मंच पर 9 विद्वानों को सम्मानित किया 28 Years of ‘Dil Se…’: जब प्यार, आतंक और राजनीति को मणिरत्नम ने दी एक नई सिनेमाई भाषा Randeep Hooda Turns 50: डॉक्टर बनने का सपना छोड़ा, थिएटर से सीखा अभिनय और किरदारों में झोंक दी पूरी जान 51 शहर, 6,000 किमी और 100 दिन: राजघाट पर संपन्न हुई प्रो. सोलंकी की क्लाइमेट सत्याग्रह यात्रा India Sugar Price Hike: चीनी के दाम में रिकॉर्ड उछाल से बढ़ी चिंता, ड्यूटी-फ्री इंपोर्ट से E20 तक समझिए पूरी कहानी Delhi-Bihar TB Cases: स्क्रीनिंग में सामने आए 99 हजार से ज्यादा टीबी के मामले, जानिए क्यों बढ़ी चिंता ENG vs PAK: रूट ने सचिन के 68 टेस्ट अर्धशतकों के रिकॉर्ड की बराबरी की, पाकिस्तान पर इंग्लैंड की 195 रन की बढ़त Judicial Service Practice Rule: सुप्रीम कोर्ट ने 3 साल की प्रैक्टिस की शर्त घटाकर की 1 साल, चयन के बाद 2 साल की ट्रेनिंग और क्लर्कशिप अनिवार्य हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में पहली बार मनाई गई तुलसी जयंती , मोरारी बापू ने वैश्विक मंच पर 9 विद्वानों को सम्मानित किया 28 Years of ‘Dil Se…’: जब प्यार, आतंक और राजनीति को मणिरत्नम ने दी एक नई सिनेमाई भाषा Randeep Hooda Turns 50: डॉक्टर बनने का सपना छोड़ा, थिएटर से सीखा अभिनय और किरदारों में झोंक दी पूरी जान 51 शहर, 6,000 किमी और 100 दिन: राजघाट पर संपन्न हुई प्रो. सोलंकी की क्लाइमेट सत्याग्रह यात्रा

Judicial Service Practice Rule: सुप्रीम कोर्ट ने 3 साल की प्रैक्टिस की शर्त घटाकर की 1 साल, चयन के बाद 2 साल की ट्रेनिंग और क्लर्कशिप अनिवार्य

सुप्रीम कोर्ट ने 3 साल की प्रैक्टिस की शर्त में बदलाव किया है। जानिए 31 मार्च 2027 तक कानून स्नातकों को क्या राहत मिलेगी और चयन के बाद किन प्रक्रियाओं से गुजरना होगा।

नई दिल्ली: सिविल जज (जूनियर डिवीजन) की सीधी भर्ती के लिए अनिवार्य कानूनी प्रैक्टिस को लेकर चल रही लंबी कानूनी बहस पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार, 21 अगस्त को बड़ा फैसला सुनाया। अदालत ने मई 2025 के उस फैसले को पूरी तरह वापस लेने से इनकार कर दिया, जिसमें न्यायिक सेवा में प्रवेश के लिए कम से कम तीन साल की वकालत का अनुभव अनिवार्य किया गया था। हालांकि, कोर्ट ने इस शर्त में महत्वपूर्ण बदलाव करते हुए तीन साल की अनिवार्य प्रैक्टिस को घटाकर एक साल कर दिया है। साथ ही चयनित उम्मीदवारों के लिए एक साल की गहन ट्रेनिंग और उसके बाद एक साल की संरचित लॉ क्लर्कशिप अनिवार्य की गई है।

यह फैसला उन हजारों कानून स्नातकों के लिए महत्वपूर्ण है, जो लॉ की पढ़ाई पूरी करने के तुरंत बाद न्यायिक सेवा परीक्षा में शामिल होना चाहते हैं। अदालत ने एक तरफ यह माना कि न्यायिक अधिकारी के रूप में नियुक्ति से पहले कानून के व्यावहारिक पक्ष से परिचित होना जरूरी है, वहीं दूसरी तरफ तीन साल की अनिवार्य प्रैक्टिस से युवा और प्रतिभाशाली उम्मीदवारों के सामने पैदा होने वाली कठिनाइयों को भी ध्यान में रखा।

क्या है सुप्रीम कोर्ट का नया फैसला?

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने न्यायिक सेवा में प्रवेश के लिए पहले से लागू तीन साल की प्रैक्टिस की शर्त में बदलाव किया। पीठ में मुख्य न्यायाधीश के अलावा जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और जस्टिस के. विनोद चंद्रन शामिल थे। बहुमत से दिए गए फैसले में CJI सूर्यकांत और जस्टिस मसीह ने नई व्यवस्था का समर्थन किया, जबकि जस्टिस विनोद चंद्रन ने असहमति जताई।

नई व्यवस्था के मुताबिक, 1 अप्रैल 2027 या उसके बाद जारी होने वाले न्यायिक सेवा भर्ती नोटिफिकेशन के तहत सिविल जज (जूनियर डिवीजन) पद के लिए आवेदन करने वाले उम्मीदवारों के पास कम से कम एक साल की सक्रिय कानूनी प्रैक्टिस होनी चाहिए। इस प्रैक्टिस को प्रमाणित करने के लिए प्रैक्टिस सर्टिफिकेट की व्यवस्था होगी और कोर्ट ने कहा है कि यह प्रमाणपत्र तभी जारी किया जाए, जब उम्मीदवार की वास्तविक न्यायिक कार्यवाही में मौजूदगी और भागीदारी का रिकॉर्ड उपलब्ध हो।

लेकिन सिर्फ एक साल की प्रैक्टिस पूरी करना ही पर्याप्त नहीं होगा। परीक्षा में सफल होने के बाद उम्मीदवार को एक साल की इंटेंसिव ट्रेनिंग राज्य की न्यायिक अकादमी में करनी होगी। इसके बाद उसे एक साल की क्लर्कशिप से गुजरना होगा।

इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने पहले की तीन साल की प्रैक्टिस व्यवस्था को पूरी तरह खत्म करने के बजाय उसके एक हिस्से को संस्थागत प्रशिक्षण और न्यायिक क्लर्कशिप से जोड़ दिया है।

31 मार्च 2027 तक क्या रहेंगे नियम?

फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा उन कानून स्नातकों के लिए है जो इस समय न्यायिक सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं या जिनकी भर्ती प्रक्रिया संक्रमणकाल में है।

सुप्रीम कोर्ट ने 20 मई 2025 से 31 मार्च 2027 तक की संक्रमण अवधि के लिए तीन साल की प्रैक्टिस की शर्त को लागू नहीं किया है। इस अवधि में जारी होने वाले न्यायिक सेवा परीक्षा नोटिफिकेशन के लिए कानून स्नातक बिना पूर्व कानूनी प्रैक्टिस के भी आवेदन कर सकेंगे। कोर्ट ने ऐसे उम्मीदवारों को आवेदन के उद्देश्य से एक साल की Active Practice पूरी कर चुका माना है और इस अवधि के लिए अलग से Practice Certificate पेश करने की जरूरत नहीं होगी।

हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि चयन के बाद उन्हें सीधे नियमित सिविल जज के रूप में काम करने की अनुमति मिल जाएगी। चयनित उम्मीदवारों को पहले Trainee Judicial Officer के रूप में नियुक्त किया जाएगा। उन्हें एक साल की ज्यूडिशियल एकेडमी ट्रेनिंग और उसके बाद एक साल की क्लर्कशिप पूरी करनी होगी।

यानी संक्रमण अवधि में नए कानून स्नातकों को परीक्षा में बैठने के लिए तीन साल तो दूर, एक साल की वास्तविक प्रैक्टिस भी जरूरी नहीं होगी। लेकिन चयन के बाद उन्हें व्यावहारिक और न्यायिक प्रशिक्षण के दो चरण पूरे करने होंगे।

चयन के बाद दो साल का प्रशिक्षण कैसे होगा?

सुप्रीम कोर्ट ने चयनित उम्मीदवारों के लिए प्रशिक्षण की पूरी संरचना भी तय की है।

पहले चरण में Trainee Judicial Officer को एक साल तक संबंधित State Judicial Academy में गहन ट्रेनिंग दी जाएगी। अदालत के मुताबिक यह प्रशिक्षण न्यायिक कार्य के व्यावहारिक पहलुओं से उम्मीदवारों को परिचित कराने का महत्वपूर्ण माध्यम होगा।

इसके बाद एक साल की क्लर्कशिप होगी। इसे दो हिस्सों में बांटा गया है।

पहले छह महीने Trainee Judicial Officer को Principal District Judge या Higher Judicial Service के किसी सदस्य के अधीन लॉ क्लर्क के रूप में काम करना होगा। इसके बाद के छह महीने संबंधित हाई कोर्ट के किसी sitting judge के अधीन clerkship करनी होगी।

इस व्यवस्था का उद्देश्य उम्मीदवार को निचली अदालत और हाई कोर्ट—दोनों स्तरों की न्यायिक कार्यप्रणाली से परिचित कराना है। यानी उम्मीदवार केवल परीक्षा पास करके सीधे अदालत में नहीं बैठेगा, बल्कि उसे नियुक्ति के बाद दो साल की संरचित व्यावहारिक प्रक्रिया से गुजरना होगा।

ट्रेनिंग के दौरान कितनी मिलेगी रकम?

सुप्रीम कोर्ट ने प्रशिक्षण अवधि में उम्मीदवारों के आर्थिक हित को भी ध्यान में रखा है।

State Judicial Academy में एक साल की training के दौरान Trainee Judicial Officer को Judicial Magistrate First Class के सकल वेतन की आधी राशि के बराबर पारिश्रमिक दिया जाएगा। इसके बाद एक साल की क्लर्कशिप के दौरान भी उसे वही परिलब्धियाँ मिलेंगी, जो न्यायिक अकादमी में ट्रेनिंग के दौरान निर्धारित किए गए हैं।

इसका मतलब है कि प्रशिक्षण और क्लर्कशिप का पूरा समय बिना किसी आर्थिक सहायता के नहीं होगा। अदालत ने इसे न्यायिक सेवा में प्रवेश की नई प्रशिक्षण-आधारित व्यवस्था का हिस्सा बनाया है।

मई 2025 में क्या फैसला हुआ था?

इस पूरे विवाद की शुरुआत सुप्रीम कोर्ट के मई 2025 के फैसले से हुई थी। उस फैसले में कोर्ट ने सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के पद पर सीधी भर्ती के लिए कम से कम तीन साल की कानूनी प्रैक्टिस को अनिवार्य किया था। इससे पहले नए कानून स्नातकों को बिना तीन साल की अनिवार्य प्रैक्टिस के न्यायिक सेवा परीक्षा में शामिल होने का रास्ता उपलब्ध था।

मई 2025 के फैसले ने अदालत की उस पुरानी व्यवस्था को बदला था, जिसके तहत 2002 में Fresh Law Graduates को सीधे न्यायिक सेवा में प्रवेश की अनुमति दी गई थी। 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने यह तर्क दिया था कि ट्रायल कोर्ट में न्यायिक जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारियों को अदालत और वकालत की व्यावहारिक प्रक्रिया का पर्याप्त अनुभव होना चाहिए।

इसके बाद कई Review Petitions दायर की गईं। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि तीन साल की अनिवार्य प्रैक्टिस से कानून की पढ़ाई पूरी करने के तुरंत बाद न्यायिक सेवा में जाने की तैयारी करने वाले उम्मीदवारों को अनावश्यक रूप से लंबा इंतजार करना पड़ेगा।

तीन साल की शर्त के खिलाफ तर्क?

Review Petitions में सबसे प्रमुख तर्क यह था कि न्यायिक सेवा के लिए उम्मीदवार की क्षमता का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि उसने कितने साल वकालत की है।

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि कानून की पढ़ाई के दौरान छात्रों को internships, court visits और practical exposure मिलता है। इसके अलावा न्यायिक सेवा में चयन के बाद भी Judicial Academies में प्रशिक्षण दिया जाता है। ऐसे में तीन साल की अनिवार्य litigation practice को एकमात्र रास्ता बनाना जरूरी नहीं है।

यह भी तर्क दिया गया कि तीन साल की waiting period से प्रतिभाशाली law graduates न्यायिक सेवा की जगह दूसरे career options चुन सकते हैं। खासकर युवा उम्मीदवारों के लिए तीन साल तक वकालत करने के बाद न्यायिक परीक्षा की तैयारी करना कठिन हो सकता है।

याचिकाकर्ताओं ने आर्थिक और सामाजिक पहलुओं का भी उल्लेख किया। उनका कहना था कि शुरुआती वर्षों में कई युवा वकीलों की आमदनी सीमित होती है और हर कानून स्नातक के लिए तीन साल तक litigation practice करना आसान नहीं है। इस वजह से आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आने वाले उम्मीदवारों पर इसका अधिक असर पड़ सकता है।

महिलाओं और दिव्यांग उम्मीदवारों को लेकर भी उठी थी चिंता

सुनवाई के दौरान तीन साल की शर्त के संभावित सामाजिक प्रभावों पर भी चर्चा हुई। याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि लंबी waiting period का असर महिलाओं और दिव्यांग उम्मीदवारों पर विशेष रूप से पड़ सकता है।

सुनवाई के दौरान यह तर्क दिया गया कि अगर कानून की पढ़ाई के बाद तीन साल का इंतजार अनिवार्य होगा तो कई युवा महिलाएं न्यायिक सेवा को करियर विकल्प के रूप में चुनने से पीछे हट सकती हैं। परिवार, विवाह, स्थानांतरण और अन्य सामाजिक परिस्थितियां उनके लिए लगातार प्रैक्टिस करना कठिन बना सकती हैं।

दिव्यांग उम्मीदवारों के लिए भी तीन साल की शर्त में राहत की मांग को लेकर अलग याचिका अदालत के सामने आई थी। सुप्रीम कोर्ट ने अपने नए ढांचे में यह भी कहा कि नई व्यवस्था में दिव्यांग व्यक्तियों से जुड़े accommodation के मुद्दों को पर्याप्त रूप से संबोधित किया गया है।

LLM को प्रैक्टिस के बराबर नहीं माना गया

फैसले की सुनवाई के दौरान यह सवाल भी उठा कि क्या Higher Legal Education, जैसे LLM, को practical legal experience के बराबर माना जा सकता है। अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। CJI ने स्पष्ट किया कि postgraduate degree को बार में practical experience के बराबर नहीं माना गया है।

इसका मतलब है कि 2027 के बाद लागू होने वाली एक साल की active practice की शर्त को केवल LLM या अन्य postgraduate legal qualification के आधार पर पूरा नहीं माना जाएगा।

जस्टिस के. विनोद चंद्रन ने जताई असहमति

तीन सदस्यीय पीठ में फैसला सर्वसम्मत नहीं था। जस्टिस के. विनोद चंद्रन ने असहमतिपूर्ण मत दिया।

उन्होंने review petitions को खारिज करते हुए मई 2025 के फैसले को बरकरार रखने की राय दी। यानी उनके अनुसार तीन साल की practice requirement में इस तरह का बदलाव नहीं किया जाना चाहिए था।

वहीं CJI सूर्यकांत और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह बहुमत में रहे। इस वजह से बहुमत का फैसला लागू होगा और न्यायिक सेवा की भर्ती के लिए नई व्यवस्था प्रभावी होगी।

हमेशा के लिए तय नहीं यह व्यवस्था

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि नई व्यवस्था को अंतिम और अपरिवर्तनीय नहीं माना जाना चाहिए।

अदालत के मुताबिक, नई प्रणाली के प्रभाव का आकलन उसके कुछ समय तक लागू होने के बाद ही संभव होगा। कोर्ट ने लगभग तीन साल की संस्थागत अनुभव के बाद इस व्यवस्था की समीक्षा की संभावना जताई है, ताकि यह देखा जा सके कि ट्रेनिंग और क्लर्कशिप से न्यायिक सेवा में आने वाले अधिकारियों की गुणवत्ता तथा क्षमता में अपेक्षित सुधार हो रहा है या नहीं।

इसका मतलब है कि भविष्य में उपलब्ध अनुभव और आंकड़ों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट इस व्यवस्था में दोबारा बदलाव कर सकता है।

ये भी पढ़ें :- 51 शहर, 6,000 किमी और 100 दिन: राजघाट पर संपन्न हुई प्रो. सोलंकी की क्लाइमेट सत्याग्रह यात्रा

Home » Judicial Service Practice Rule: सुप्रीम कोर्ट ने 3 साल की प्रैक्टिस की शर्त घटाकर की 1 साल, चयन के बाद 2 साल की ट्रेनिंग और क्लर्कशिप अनिवार्य
शेयर करें: Facebook X WhatsApp

MD Faijan

लेखक

मोहम्मद फैजान न्यूज़ ऑफ द डे में पत्रकार हैं, जहाँ वे खेल, मनोरंजन, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों को कवर करते हैं। इससे पहले वे यूट्यूब चैनल स्पोर्ट्स यारी में सोशल मीडिया एग्जीक्यूटिव के रूप में कार्य कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने डिजिटल कंटेंट मैनेजमेंट और ऑडियंस एंगेजमेंट का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के कोरिया जिले से संबंध रखने वाले फैजान आधुनिक मीडिया कार्यप्रणालियों की अच्छी समझ रखते हैं और कहानी कहने के विभिन्न रूपों में गहरी रुचि रखते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

// न्यूज़लेटर

हर सुबह सबसे पहले ख़बरें।

अपना ईमेल दर्ज करें — कोई स्पैम नहीं, सिर्फ ज़रूरी खबरें।

Exit mobile version