Thursday, 06 August 2026
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Hiroshima Day: 81 साल पहले हिरोशिमा पर बरसा था परमाणु कहर, जानिए कैसे ‘लिटिल बॉय’ ने थाम दी थी लाखों जिंदगियां

81वीं हिरोशिमा डे पर दुनिया उन लाखों लोगों को याद कर रही है, जिन्होंने परमाणु हमले की कीमत अपनी जान देकर चुकाई। पढ़िए ‘लिटिल बॉय’ हमले, नागासाकी और द्वितीय विश्व युद्ध के अंत की पूरी कहानी।

टोक्यो/नई दिल्ली: 6 अगस्त 1945… सुबह के करीब 8 बजकर 15 मिनट हो रहा थे। जापान का शहर हिरोशिमा अपने रोजमर्रा के कामों में व्यस्त था। स्कूल खुल चुके थे, दफ्तरों में कर्मचारी पहुंच रहे थे और बच्चे सड़कों पर दिखाई दे रहे थे। तभी आसमान से एक अमेरिकी B-29 बमवर्षक विमान एनोला गे (Enola Gay) गुजरा। कुछ ही सेकंड बाद ऐसा धमाका हुआ, जिसने न केवल एक पूरे शहर को लगभग मिटा दिया, बल्कि मानव इतिहास की दिशा भी हमेशा के लिए बदल दी।

करीब 15 किलोटन क्षमता वाले ‘लिटिल बॉय’ (Little Boy) परमाणु बम ने पलक झपकते ही हजारों लोगों की जान ले ली। देखते ही देखते इमारतें धूल में बदल गईं, तापमान हजारों डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया और पूरा शहर रेडियोधर्मी विकिरण की चपेट में आ गया।

इसके ठीक तीन दिन बाद नागासाकी पर दूसरा परमाणु हमला हुआ और इसके साथ ही द्वितीय विश्व युद्ध का अंत तेज हो गया, लेकिन इंसानियत के इतिहास पर ऐसा घाव दर्ज हो गया जो आज भी नहीं भरा है।

आज, 6 अगस्त 2026 को हिरोशिमा डे की 81वीं वर्षगांठ पर पूरी दुनिया उन लाखों लोगों को याद कर रही है, जिन्होंने परमाणु हथियारों की भयावहता की कीमत अपनी जान देकर चुकाई। यह दिन केवल इतिहास को याद करने का नहीं, बल्कि यह समझने का भी है कि युद्ध की सबसे बड़ी कीमत हमेशा आम नागरिकों को चुकानी पड़ती है।

द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि

1939 में शुरू हुआ द्वितीय विश्व युद्ध धीरे-धीरे पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले चुका था। एक ओर जर्मनी, इटली और जापान की धुरी शक्तियां (Axis Powers) थीं, वहीं दूसरी ओर अमेरिका, ब्रिटेन, सोवियत संघ और उनके सहयोगी मित्र राष्ट्र (Allied Powers) थे।

1945 तक यूरोप में जर्मनी हार चुका था। मई 1945 में नाजी जर्मनी के आत्मसमर्पण के बाद युद्ध का मुख्य मोर्चा एशिया-प्रशांत क्षेत्र में बचा था, जहां जापान अब भी लड़ाई जारी रखे हुए था।

हालांकि अमेरिकी सेना ने जापान के कई शहरों पर भारी बमबारी की थी, लेकिन जापानी सैन्य नेतृत्व आत्मसमर्पण के लिए तैयार नहीं था। अमेरिका को आशंका थी कि यदि जापान पर पारंपरिक सैन्य हमला किया गया तो लाखों सैनिकों और नागरिकों की जान जा सकती है। यहीं से परमाणु बम के इस्तेमाल पर गंभीर विचार शुरू हुआ।

दुनिया का सबसे गोपनीय सैन्य अभियान

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका ने ब्रिटेन और कनाडा के सहयोग से मैनहट्टन प्रोजेक्ट (Manhattan Project) शुरू किया। इसका उद्देश्य दुनिया का पहला परमाणु हथियार विकसित करना था। इस परियोजना में जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर, एनरिको फर्मी और कई अन्य वैज्ञानिकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

16 जुलाई 1945 को न्यू मैक्सिको के रेगिस्तान में “ट्रिनिटी टेस्ट” सफल रहा। यह मानव इतिहास का पहला परमाणु विस्फोट था। इसके बाद अमेरिका के पास ऐसा हथियार था, जिसे पहले कभी युद्ध में इस्तेमाल नहीं किया गया था।

आखिर हिरोशिमा ही क्यों चुना गया?

हिरोशिमा पर परमाणु बम गिराने का फैसला अमेरिका ने कई सैन्य और रणनीतिक कारणों को ध्यान में रखकर लिया था। उस समय अमेरिकी सेना ने जापान के कई शहरों का अध्ययन किया, लेकिन अंततः हिरोशिमा को प्राथमिक लक्ष्य बनाया गया।

यह शहर जापानी सेना का एक महत्वपूर्ण सैन्य और लॉजिस्टिक केंद्र था, जहां बड़ी संख्या में सैनिकों की आवाजाही होती थी और सैन्य मुख्यालय भी मौजूद था। इसके अलावा, हिरोशिमा पहले बड़े पैमाने की बमबारी से लगभग अछूता रहा था, इसलिए अमेरिकी अधिकारियों का मानना था कि यहां परमाणु बम के वास्तविक प्रभाव का स्पष्ट आकलन किया जा सकेगा। शहर की भौगोलिक बनावट भी ऐसी थी कि विस्फोट का असर व्यापक क्षेत्र में फैल सकता था।

हालांकि, युद्ध समाप्त होने के बाद इस निर्णय पर गंभीर नैतिक और मानवीय सवाल उठे। कई इतिहासकारों और मानवाधिकार विशेषज्ञों का मानना है कि किसी घनी आबादी वाले शहर को निशाना बनाना मानवता के इतिहास के सबसे विवादित सैन्य फैसलों में से एक था, जिस पर आज भी बहस जारी है।

जब हिरोशिमा पर गिरा लिटिल बॉय

6 अगस्त 1945 की सुबह अमेरिकी B-29 बमवर्षक विमान Enola Gay टिनियन द्वीप से उड़ान भरकर जापान के हिरोशिमा पहुंचा। सुबह 8 बजकर 15 मिनट पर विमान से ‘लिटिल बॉय’ (Little Boy) नाम का यूरेनियम आधारित परमाणु बम गिराया गया।

यह बम जमीन से लगभग 600 मीटर की ऊंचाई पर विस्फोटित हुआ। विस्फोट इतना शक्तिशाली था कि कुछ ही सेकंड में हजारों इमारतें मलबे में बदल गईं और पूरे शहर में भीषण आग फैल गई। अत्यधिक तापमान ने विस्फोट के केंद्र के आसपास मौजूद लोगों को मौके पर ही जला दिया, जबकि तेज शॉक वेव ने कई किलोमीटर तक इमारतों और बुनियादी ढांचे को तबाह कर दिया।

प्रत्यक्षदर्शियों ने बाद में बताया कि उन्हें ऐसा लगा मानो सूरज अचानक धरती पर उतर आया हो। यह हमला मानव इतिहास में युद्ध के दौरान परमाणु हथियार के पहले इस्तेमाल के रूप में दर्ज हुआ, जिसने पूरी दुनिया को परमाणु विनाश की भयावहता से रूबरू करा दिया।

हमले में हिरोशिमा का कितना नुकसान?

हिरोशिमा पर हुए परमाणु हमले ने शहर को लगभग पूरी तरह तबाह कर दिया। अनुमान है कि शहर की करीब 70 प्रतिशत इमारतें पूरी तरह नष्ट हो गईं, जबकि अधिकांश शेष संरचनाएं भी गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हुईं। अस्पताल, स्कूल, सरकारी कार्यालय, कारखाने और हजारों घर मलबे में बदल गए। चिकित्सा व्यवस्था भी लगभग ध्वस्त हो गई, क्योंकि करीब 90 प्रतिशत डॉक्टर और नर्स या तो मारे गए या घायल हो गए। इससे घायलों का इलाज करना बेहद कठिन हो गया।

वर्ष 1945 के अंत तक लगभग 1.40 लाख लोगों की मौत होने का अनुमान लगाया गया। इनमें बड़ी संख्या उन लोगों की थी, जिन्होंने विस्फोट के तुरंत बाद नहीं, बल्कि रेडिएशन, गंभीर जलन, संक्रमण और अन्य स्वास्थ्य जटिलताओं के कारण बाद में दम तोड़ा। इस त्रासदी ने लाखों लोगों का जीवन हमेशा के लिए बदल दिया और आने वाली पीढ़ियों तक इसके दुष्प्रभाव महसूस किए गए।

तीन दिन बाद नागासाकी पर दूसरा परमाणु हमला

हिरोशिमा पर हमले के बाद भी जापान ने तत्काल आत्मसमर्पण नहीं किया। अमेरिकी नेतृत्व का मानना था कि केवल एक परमाणु हमला जापानी सरकार को युद्ध समाप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। इसी बीच सोवियत संघ ने भी 8 अगस्त 1945 को जापान के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी और मंचूरिया में जापानी सेना पर हमला शुरू कर दिया।

9 अगस्त 1945 को अमेरिका ने जापान के नागासाकी शहर पर दूसरा परमाणु बम ‘फैट मैन’ (Fat Man) गिराया। यह प्लूटोनियम आधारित बम था, जिसकी विनाशकारी क्षमता हिरोशिमा पर गिराए गए ‘लिटिल बॉय’ से अधिक मानी जाती है। हालांकि मौसम और भौगोलिक परिस्थितियों के कारण इसका प्रभाव अपेक्षाकृत सीमित क्षेत्र में रहा, लेकिन तब भी शहर का बड़ा हिस्सा तबाह हो गया।

वर्ष 1945 के अंत तक नागासाकी में लगभग 70,000 लोगों की मौत हो चुकी थी। हिरोशिमा और नागासाकी पर हुए इन दोनों हमलों में अधिकांश पीड़ित आम नागरिक थे।

जापान ने आत्मसमर्पण किया

हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु हमलों के बाद जापान की स्थिति तेजी से कमजोर होती चली गई। दूसरी ओर सोवियत संघ के युद्ध में शामिल होने से जापान के सामने दो मोर्चों पर लड़ाई की चुनौती खड़ी हो गई। इन परिस्थितियों में सम्राट हिरोहितो ने पहली बार सीधे हस्तक्षेप किया और युद्ध समाप्त करने का निर्णय लिया।

15 अगस्त 1945 को सम्राट ने रेडियो संदेश के जरिए जापानी जनता को संबोधित करते हुए आत्मसमर्पण की घोषणा की। इसके बाद 2 सितंबर 1945 को अमेरिकी युद्धपोत यूएसएस मिसौरी (USS Missouri) पर आधिकारिक दस्तावेजों पर हस्ताक्षर हुए और द्वितीय विश्व युद्ध औपचारिक रूप से समाप्त हो गया।

दशकों तक झेलनी पड़ी विस्फोट की तबाही

हिरोशिमा और नागासाकी की त्रासदी केवल विस्फोट तक सीमित नहीं थी। असली विनाश उसके बाद शुरू हुआ। परमाणु विकिरण के कारण हजारों लोग वर्षों तक कैंसर, ल्यूकेमिया, हृदय रोग, आंखों की बीमारियों और अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझते रहे। कई गर्भवती महिलाओं के बच्चों में जन्मजात विकृतियां देखी गईं और आने वाली पीढ़ियों तक रेडिएशन के प्रभाव को लेकर अध्ययन होते रहे।

इन पीड़ितों को जापान में ‘हिबाकुशा’ (Hibakusha) कहा जाता है। लंबे समय तक उन्हें सामाजिक भेदभाव का भी सामना करना पड़ा क्योंकि कई लोग मानते थे कि विकिरण का प्रभाव अगली पीढ़ियों तक जाएगा। हालांकि बाद के वैज्ञानिक अध्ययनों ने इस विषय पर अधिक स्पष्ट जानकारी दी, लेकिन उस समय भय और सामाजिक दूरी ने हजारों परिवारों का जीवन प्रभावित किया।

क्या परमाणु बम गिराना जरूरी था?

हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु हमले को लेकर आज भी इतिहासकारों और विशेषज्ञों के बीच मतभेद हैं।

अमेरिका का आधिकारिक तर्क था कि यदि जापान पर सीधा सैन्य हमला किया जाता, तो दोनों पक्षों के लाखों सैनिक और नागरिक मारे जाते। परमाणु बम के इस्तेमाल से युद्ध जल्दी समाप्त हुआ और कुल मिलाकर अधिक जानें बचीं।

दूसरी ओर अनेक इतिहासकार, मानवाधिकार संगठन और परमाणु निरस्त्रीकरण समर्थक मानते हैं कि जापान पहले ही सैन्य रूप से बेहद कमजोर हो चुका था और सोवियत संघ के युद्ध में शामिल होने के बाद उसके आत्मसमर्पण की संभावना बढ़ गई थी। उनके अनुसार, इतने बड़े पैमाने पर नागरिक आबादी पर परमाणु हथियार का इस्तेमाल नैतिक रूप से उचित नहीं ठहराया जा सकता।

बदले अंतरराष्ट्रीय नियम

हिरोशिमा और नागासाकी की त्रासदी ने पूरी दुनिया को परमाणु हथियारों के खतरों का एहसास कराया। इसके बाद परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने और निरस्त्रीकरण को बढ़ावा देने के लिए कई अंतरराष्ट्रीय प्रयास शुरू हुए।

1968 में परमाणु अप्रसार संधि (NPT) अस्तित्व में आई, जिसका उद्देश्य परमाणु हथियारों का प्रसार रोकना और शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा को बढ़ावा देना था। इसके बाद व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (CTBT) जैसे प्रयास हुए, हालांकि यह अभी तक पूरी तरह लागू नहीं हो सकी है।

2017 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने परमाणु हथियार निषेध संधि (Treaty on the Prohibition of Nuclear Weapons – TPNW) को मंजूरी दी। इस संधि का उद्देश्य परमाणु हथियारों को पूरी तरह प्रतिबंधित करना है। हालांकि अमेरिका, रूस, चीन, भारत, पाकिस्तान और अन्य परमाणु शक्ति संपन्न देशों ने इसमें भाग नहीं लिया।

आज भी परमाणु हथियारों का खतरा बरकरार

हिरोशिमा और नागासाकी के बाद युद्ध में दोबारा परमाणु हथियारों का इस्तेमाल नहीं हुआ, लेकिन दुनिया आज भी परमाणु हथियारों से मुक्त नहीं है।

अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन, भारत, पाकिस्तान, उत्तर कोरिया और इजरायल (जिसने आधिकारिक पुष्टि नहीं की है) जैसे देशों के पास परमाणु हथियार होने का अनुमान है।

वैश्विक तनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध, उत्तर कोरिया के मिसाइल परीक्षण और विभिन्न भू-राजनीतिक संघर्षों के बीच परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की आशंका समय-समय पर वैश्विक चिंता बढ़ाती रही है।

81 साल बाद भी क्यों प्रासंगिक है हिरोशिमा डे?

आज हिरोशिमा एक आधुनिक, विकसित और जीवंत शहर है, लेकिन उसकी पहचान केवल विकास से नहीं, बल्कि उस त्रासदी से भी जुड़ी है जिसने पूरी मानवता को झकझोर कर रख दिया था। हिरोशिमा डे हमें याद दिलाता है कि विज्ञान और तकनीक का उपयोग यदि विनाश के लिए किया जाए तो उसके परिणाम पीढ़ियों तक भुगतने पड़ सकते हैं।

यह दिन केवल जापान का नहीं, बल्कि पूरी दुनिया का स्मृति दिवस बन चुका है। यह युद्ध की भयावहता, नागरिकों की पीड़ा और शांति की आवश्यकता का संदेश देता है। 81 वर्ष बाद भी हिरोशिमा की कहानी यह सिखाती है कि किसी भी संघर्ष का स्थायी समाधान हथियार नहीं, बल्कि संवाद, कूटनीति और मानवता के मूल्यों में ही छिपा है।

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MD Faijan

लेखक

मोहम्मद फैजान न्यूज़ ऑफ द डे में पत्रकार हैं, जहाँ वे खेल, मनोरंजन, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों को कवर करते हैं। इससे पहले वे यूट्यूब चैनल स्पोर्ट्स यारी में सोशल मीडिया एग्जीक्यूटिव के रूप में कार्य कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने डिजिटल कंटेंट मैनेजमेंट और ऑडियंस एंगेजमेंट का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के कोरिया जिले से संबंध रखने वाले फैजान आधुनिक मीडिया कार्यप्रणालियों की अच्छी समझ रखते हैं और कहानी कहने के विभिन्न रूपों में गहरी रुचि रखते हैं।

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