हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो ने एक बार फिर बच्चों में मोबाइल फोन की बढ़ती लत को लेकर चिंता गहरा दी है। वीडियो में एक सभागार में बैठे सैकड़ों बच्चों में से अधिकांश के हाथों में मोबाइल दिखाई दे रहा है। कई बच्चे आंखें टिकाए स्क्रीन में डूबे नजर आ रहे हैं, जबकि कुछ तो पूरी तरह मोबाइल में खो गए हैं।
यह वीडियो एक चिकित्सा जागरूकता सत्र के दौरान का है, जिसमें डॉक्टर और विशेषज्ञ बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर मोबाइल के दुष्प्रभाव के बारे में जानकारी दे रहे थे। वीडियो पर कैप्शन है — “मोबाइल फोन बच्चों के स्वास्थ्य के लिए बहुत बड़ा खतरा है।”
बच्चों में मोबाइल की लत: क्या कहता है अध्ययन?
हाल के अध्ययनों के अनुसार, 8 से 14 वर्ष के बच्चों में प्रतिदिन औसतन 4–6 घंटे मोबाइल का उपयोग हो रहा है।
इससे बच्चों में नींद की कमी, आंखों में जलन, चिड़चिड़ापन और पढ़ाई में गिरावट जैसे लक्षण देखने को मिल रहे हैं।
WHO (विश्व स्वास्थ्य संगठन) ने भी 2023 में 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम शून्य से कम रखने की सिफारिश की थी।
मोबाइल की लत के दुष्परिणाम:
मस्तिष्क विकास में बाधा:
निरंतर स्क्रीन पर समय बिताने से बच्चे की एकाग्रता और स्मृति क्षमता पर असर पड़ता है।
मानसिक तनाव और अवसाद:
सोशल मीडिया और वीडियो गेम की लत से बच्चों में अकेलापन और अवसाद की शिकायतें बढ़ रही हैं।
शारीरिक समस्याएं:
मोबाइल के अत्यधिक उपयोग से आंखों की रोशनी कमजोर, गर्दन दर्द, और मोटापा जैसी समस्याएं हो रही हैं।
सामाजिक कौशल में गिरावट:
वास्तविक दुनिया में बातचीत और व्यवहार में हिचकिचाहट, असहिष्णुता बढ़ रही है।
समाधान और सुझाव:
स्क्रीन टाइम पर नियंत्रण:
5 से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए प्रति दिन 1 से 1.5 घंटे से अधिक मोबाइल का उपयोग न हो।
डिजिटल डिटॉक्स डे:
हर सप्ताह एक दिन मोबाइल-मुक्त दिवस परिवार में तय करें।
ऑफलाइन गतिविधियों को बढ़ावा दें:
बच्चों को खेल, चित्रकला, किताबें, संगीत आदि में रुचि दिलाएं।
परिवार समय को प्राथमिकता दें:
खाना खाते समय, घूमते समय मोबाइल को दूर रखें, परिवार के साथ संवाद करें।
सक्रिय माता-पिता की भूमिका:
माता-पिता को स्वयं मोबाइल का संतुलित उपयोग करना होगा, तभी बच्चे अनुसरण करेंगे।
विशेषज्ञों की राय:
डॉ. अनुपमा शेखावत, बाल मानसिक रोग विशेषज्ञ के अनुसार –
“मोबाइल बच्चों के मनोरंजन का साधन बन गया है, लेकिन अति उपयोग ने उन्हें आभासी दुनिया में कैद कर दिया है। इसका समय रहते समाधान आवश्यक है, नहीं तो यह एक पीढ़ीगत संकट में बदल सकता है।”
समाज की जिम्मेदारी:
स्कूलों, अभिभावकों और सरकार को मिलकर एक राष्ट्रीय डिजिटल संतुलन अभियान शुरू करना चाहिए, ताकि तकनीक बच्चों के लिए साधन बने, न कि नियंत्रणकर्ता।
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