Friday, 02 October 2026
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36 Years of Ghayal: वह फिल्म जिसने सनी देओल को सुपरस्टार से ‘जनता का हीरो’ बनाने वाली फिल्म, जानिए घायल से जुड़े कई अनसुने किस्से

22 जून 1990 को रिलीज हुई ‘घायल’ ने सनी देओल को नया स्टारडम दिया। जानिए फिल्म के निर्माण, क्लैश और सफलता से जुड़े दिलचस्प किस्से।

हिंदी सिनेमा में कुछ फिल्में सिर्फ बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं होतीं, बल्कि एक दौर की पहचान बन जाती हैं। ऐसी ही एक फिल्म थी ‘घायल’, जिसने सनी देओल को सिर्फ एक एक्शन स्टार नहीं बल्कि आम आदमी के गुस्से की आवाज बना दिया।

सदी के महानायक और एंग्री यंग मैन अमिताभ बच्चन की फिल्मों के बाद यदि दर्शक किसी अभिनेता या फिल्म के साथ यथार्थ जुड़ाव महसूस कर पाए तो वे शायद सनी देओल और उनकी फिल्म घातक ही थी।

आज इस फिल्म को रिलीज हुए 36 साल पूरे हो चुके हैं, लेकिन इसके संवाद, इसके दृश्य और इसका असर आज भी दर्शकों के जेहन में ताजा है।

राजकुमार संतोषी द्वारा निर्देशित फिल्म ‘Ghayal’ उस दौर में रिलीज हुई थी, जब हिंदी सिनेमा में बड़े पैमाने पर रोमांटिक और पारिवारिक फिल्में बन रही थीं।

ऐसे समय में एक ऐसी कहानी सामने आई जिसमें भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ लड़ते एक युवक का दर्द, गुस्सा और संघर्ष दिखाई दिया। यही वजह थी कि फिल्म ने दर्शकों से भावनात्मक जुड़ाव बना लिया और देखते ही देखते साल की सबसे चर्चित फिल्मों में शामिल हो गई।

एक भाई की तलाश से शुरू हुई कहानी

Ghayal की कहानी अजय मेहरा (सनी देओल) नाम के एक युवा मुक्केबाज के इर्द-गिर्द घूमती है। अजय अपने बड़े भाई अशोक मेहरा (राज बब्बर) को आदर्श मानता है।

लेकिन एक दिन अशोक अचानक गायब हो जाता है। जब अजय उसकी तलाश शुरू करता है, तो उसे पता चलता है कि उसके भाई का संबंध एक ऐसे शक्तिशाली कारोबारी से था जिसके राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर तक गहरे संबंध हैं।

जांच आगे बढ़ती है और अजय को अपने भाई की हत्या का पता चलता है। इसके बाद शुरू होती है एक ऐसी लड़ाई जिसमें एक अकेला युवक भ्रष्ट सिस्टम, पैसे की ताकत और राजनीतिक प्रभाव के खिलाफ खड़ा हो जाता है।

कहानी का सबसे मजबूत पक्ष यह था कि इसमें नायक किसी सुपरहीरो की तरह नहीं दिखता। वह घायल होता है, टूटता है, जेल जाता है, धोखा खाता है, लेकिन हार नहीं मानता। यही बात दर्शकों को उससे जोड़ती है।

फिल्म को नहीं मिल रहा था कोई निर्माता

आज Ghayal को एक ऑल-टाइम क्लासिक माना जाता है, लेकिन इसकी शुरुआत इतनी आसान नहीं थी। विभिन्न इंटरव्यू में सनी देओल और फिल्म से जुड़े लोगों ने बताया है कि शुरुआती दौर में कई निर्माताओं ने इस प्रोजेक्ट को ठुकरा दिया था।

कहानी गंभीर थी, नायक का किरदार पारंपरिक रोमांटिक हीरो जैसा नहीं था और फिल्म का टोन काफी आक्रामक था। कई लोगों को लगा कि यह फिल्म व्यावसायिक रूप से सफल नहीं होगी। लेकिन सनी देओल को स्क्रिप्ट पर पूरा भरोसा था।

आखिरकार फिल्म का निर्माण शुरू हुआ और यही निर्णय आगे चलकर हिंदी सिनेमा के इतिहास में दर्ज हो गया।

धर्मेंद्र का बड़ा योगदान

फिल्म Ghayal सिर्फ सनी देओल के करियर की अहम फिल्म नहीं थी, बल्कि देओल परिवार के लिए भी बेहद खास थी। क्योंकि धर्मेंद्र ने खुद इस फिल्म में निर्माता के तौर पर वापसी की। बता दें कि जब प्रोजेक्ट को लेकर संदेह था, तब उन्होंने ने अपने बेटे और फिल्म की टीम का पूरा समर्थन किया।

घायल को “विजयता फिल्म्स” के बैनर तले रिलीज किया गया था। आपको बता दें कि गायल से पहले धर्मेंद्र ने 1983 की सफल रोमांटिक फिल्म ‘बेताब’ को भी प्रोड्यूस किया था, जो कि सनी देओल की भी पहली ही फिल्म थी।

फिल्म की सफलता के बाद जब इसे कई बड़े पुरस्कार मिले, तब देओल परिवार के लिए यह गर्व का क्षण था। बाद में सनी देओल ने कई बार कहा कि इस फिल्म ने उन्हें अभिनेता के रूप में नई पहचान दी।

राजकुमार संतोषी की दमदार शुरुआत

निर्देशक राजकुमार संतोषी के लिए भी Ghayal एक निर्णायक फिल्म साबित हुई। यह उनकी शुरुआती फिल्मों में से थी और उन्होंने पहली ही कोशिश में साबित कर दिया कि वह सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि प्रभावशाली कहानी कहने की भी क्षमता रखते हैं।

फिल्म में कोर्टरूम ड्रामा, भावनात्मक दृश्य, एक्शन और सामाजिक टिप्पणी का संतुलन देखने को मिला। यही शैली आगे चलकर उनकी पहचान बनी।

‘दामिनी’, ‘घातक’ और ‘द लीजेंड ऑफ भगत सिंह’ जैसी फिल्मों में भी संतोषी ने इसी तरह का प्रभावशाली दृष्टिकोण दिखाया।

सनी देओल के करियर को मिली नई दिशा

सनी देओल पहले भी कई सफल फिल्मों में काम कर चुके थे, लेकिन Ghayal ने उन्हें बॉलीवुड में एक अलग स्तर पर पहुंचा दिया।

फिल्म में उनका गुस्सा, एक्शन और संवाद लोगों को बेहद पसंद आये। खास तौर पर कोर्टरूम ड्रामा और क्लाइमेक्स में कड़ी निगरानी के बावजूद बलवंत राय की हत्या वाला दृश्य आज भी याद किए जाते हैं। फिल्म में उनका एक डायलॉग “उतार कर फेंक दो ये वर्दी और पहन लो बलवंत राय का पट्टा अपने गले में” सुनकर आज भी लोगों के रौंगटे खड़े हो जाते हैं।

इस फिल्म के बाद सनी देओल सिर्फ एक अभिनेता नहीं रहे, बल्कि अन्याय के खिलाफ लड़ने वाले नायक की छवि के प्रतीक बन गए।

आगे चलकर ‘घातक’, ‘ज़िद्दी’, ‘इंडियन’ और ‘गदर’ जैसी फिल्मों में उनकी यह छवि और मजबूत होती गई।

अमरीश पुरी का खतरनाक रोल

किसी भी महान फिल्म के लिए एक मजबूत खलनायक जरूरी होता है और ‘घायल’ में यह जिम्मेदारी अमरीश पुरी ने निभाई।

उन्होंने बलवंत राय का किरदार निभाया, जो सत्ता, धन और गुनाह और भ्रष्टाचार का प्रतीक था। अमरीश पुरी ने इस भूमिका को इतनी मजबूती से निभाया कि वह हिंदी सिनेमा के यादगार खलनायकों में शामिल हो गई।

अजय मेहरा और बलवंत राय की टक्कर ने फिल्म की सफलता में एक अहम भूमिका निभाई।

‘दिल’ के साथ हुआ था ‘घायल’ का आमना-सामना

आपको बता दें कि, साल 1990 में 22 जून का दिन बॉलीवुड के लिए यादगार साबित हुआ।। क्योंकि उसी दिन सिनेमाघरों में घायल का सामना आमिर खान और माधुरी दिक्षित की फिल्म ‘दिल’ का साथ हुआ।

एक तरफ जहां ‘दिल’ एक रोमांटिक ड्रामा थी, वहीं ‘घायल’ एक्शन और न्याय की लड़ाई पर आधारित फिल्म थी। दोनों फिल्मों का दर्शक वर्ग अलग था, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर इनके बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा देखने को मिली।

आपको जानकर हैरानी होगी कि इस क्लैश के बावजूद भी दोनों ही फिल्मों को दर्शकों ने बराबर प्यार दिया। उस साल पैसे कमाने के मामले में पहले और दूसरे नंबर पर दिल और घायल ही थे।

दिलचस्प बात यह रही कि ट्रेड विशेषज्ञों का मानना था कि रोमांटिक माहौल के कारण ‘दिल’ को ज्यादा फायदा मिलेगा। हालांकि ‘घायल’ ने अपनी दमदार कहानी, सनी देओल के अभिनय और राजकुमार संतोषी के निर्देशन के दम पर शानदार प्रदर्शन किया।

दोनों ही फिल्में 1990 की सबसे बड़ी हिट फिल्मों में शामिल रहीं। जहां ‘दिल’ ने युवाओं और पारिवारिक दर्शकों को आकर्षित किया, वहीं ‘घायल’ ने एक्शन प्रेमियों और आम आदमी के संघर्ष को पसंद करने वाले दर्शकों का दिल जीता।

घायल ने लगाई पुरस्कारों की झड़ी

फिल्म को सिर्फ दर्शकों का प्यार ही नहीं मिला, बल्कि आलोचकों ने भी इसकी खूब सराहना की।

Ghayal ने कई प्रतिष्ठित पुरस्कार जीते। फिल्म के मुख्य नायक सनी देओल को उनके दमदार अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर अवार्ड मिला और साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर स्पेशल जूरी अवार्ड से भी नवाजा गया।

फिल्म के निर्माता धर्मेंद्र को सर्वश्रेष्ठ फिल्म और राजकुमार संतोषी को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक व सर्वश्रेष्ठ कहानी का पुरस्कार दिया गया। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में इसे मनोरंजन प्रदान करने वाली सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय फिल्म चुना गया।

इसके अलावा फिल्म ने तकनीकी क्षेत्रों में भी बड़ी उपलब्धि हासिल की, जिसमें राजन कोठारी को सिनेमैटोग्राफी, वी.एन. मयेकर को सर्वश्रेष्ठ एडिटिंग और नितीश रॉय को सर्वश्रेष्ठ आर्ट डायरेक्शन का फिल्मफेयर अवार्ड मिला।

फिल्म के यादगार संवाद

‘घायल’ की लोकप्रियता में उसके संवादों का भी बड़ा योगदान था। फिल्म के कई डायलॉग आज भी दर्शकों को याद हैं। खासकर वे दृश्य जिनमें अजय मेहरा भ्रष्ट व्यवस्था को चुनौती देता है।

फिल्म के संवाद उस दौर के युवाओं के गुस्से और निराशा को अभिव्यक्त करते थे।

घायल क्यों रही इतनी चर्चित?

36 साल बाद भी ‘घायल’ पुरानी फिल्म नहीं लगती। इसकी सबसे बड़ी वजह इसकी थीम है।

भ्रष्टाचार, सत्ता का दुरुपयोग, न्याय के लिए संघर्ष और आम आदमी की लड़ाई जैसे मुद्दे आज भी समाज में मौजूद हैं। यही कारण है कि नई पीढ़ी भी इस फिल्म से जुड़ाव महसूस कर सकती है।

फिल्म यह संदेश देती है कि व्यवस्था कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, अन्याय के खिलाफ खड़े होने का साहस हमेशा मायने रखता है।

ये भी पढें :- 127 Hours: 127 घंटे की जंग, एक फैसला और इंसानी हौसले की असाधारण कहानी

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MD Faijan

लेखक

मोहम्मद फैजान न्यूज़ ऑफ द डे में पत्रकार हैं, जहाँ वे खेल, मनोरंजन, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों को कवर करते हैं। इससे पहले वे यूट्यूब चैनल स्पोर्ट्स यारी में सोशल मीडिया एग्जीक्यूटिव के रूप में कार्य कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने डिजिटल कंटेंट मैनेजमेंट और ऑडियंस एंगेजमेंट का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के कोरिया जिले से संबंध रखने वाले फैजान आधुनिक मीडिया कार्यप्रणालियों की अच्छी समझ रखते हैं और कहानी कहने के विभिन्न रूपों में गहरी रुचि रखते हैं।

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