भारत में अलग राज्यों की मांग के पीछे भाषा, संस्कृति और प्रशासनिक जरूरतें अहम रहीं। जानिए पोट्टी श्रीरामुलु के आंदोलन, शाह आयोग की सिफारिशों और राज्य पुनर्गठन के फैसलों ने भारतीय मानचित्र का स्वरूप कैसे बदला।
नई दिल्ली: भारत के इतिहास में कुछ तारीखें ऐसी हैं, जिन्होंने देश के नक्शे और प्रशासनिक व्यवस्था को नई पहचान दी। एक नवंबर भी एक ऐसी ही तारीख है। यह दिन सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख नहीं, बल्कि भाषाई पहचान, क्षेत्रीय आकांक्षाओं और बेहतर प्रशासन की मांग से जुड़े कई बड़े फैसलों की याद दिलाता है।
आजादी के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक यह थी कि अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले और अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान रखने वाले क्षेत्रों को किस तरह एक प्रशासनिक व्यवस्था में शामिल किया जाए। कई जगहों पर लोगों ने अपनी भाषा और संस्कृति के आधार पर अलग राज्य बनाने की मांग उठाई, तो कहीं बड़े राज्यों के दूर-दराज के क्षेत्रों ने बेहतर प्रशासन और विकास के लिए अलग पहचान की जरूरत बताई।
इसी प्रक्रिया के तहत एक नवंबर को देश के नक्शे में कई महत्वपूर्ण बदलाव हुए। आइए जानते हैं उन सात राज्यों की कहानी, जिनका गठन या महत्वपूर्ण पुनर्गठन एक नवंबर को हुआ और जिनकी स्थापना के पीछे अलग-अलग ऐतिहासिक परिस्थितियां जिम्मेदार थीं।
1. मध्य प्रदेश (1956)
मध्य प्रदेश का वर्तमान स्वरूप 1 नवंबर 1956 को राज्य पुनर्गठन अधिनियम के तहत अस्तित्व में आया। आजादी के बाद मध्य भारत का यह इलाका कई प्रशासनिक इकाइयों में बंटा हुआ था। इनमें पुराना मध्य प्रदेश, मध्य भारत, विंध्य प्रदेश और भोपाल जैसे क्षेत्र शामिल थे। इनकी प्रशासनिक व्यवस्थाएं अलग-अलग थीं। देश में भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू होने के बाद इन क्षेत्रों को एक नई व्यवस्था में शामिल करने का निर्णय लिया गया।
राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के लागू होने के साथ इन क्षेत्रों का विलय कर नए मध्य प्रदेश का गठन किया गया। इस पुनर्गठन में मराठी भाषी विदर्भ क्षेत्र को तत्कालीन बॉम्बे राज्य में शामिल किया गया, जबकि मध्य भारत के हिंदी भाषी क्षेत्रों को एक बड़े राज्य के रूप में संगठित किया गया। भोपाल को नए राज्य की राजधानी बनाया गया। इस बदलाव का उद्देश्य प्रशासनिक इकाइयों को व्यवस्थित करना और समान भाषाई-सांस्कृतिक पहचान वाले क्षेत्रों को एक प्रशासनिक ढांचे में लाना था।
नए मध्य प्रदेश का क्षेत्रफल काफी बड़ा था। इसके कारण राज्य के अलग-अलग हिस्सों में प्रशासनिक पहुंच और विकास योजनाओं को लागू करना एक बड़ी जिम्मेदारी बनी। बाद में इसी विशाल राज्य के दक्षिण-पूर्वी हिस्से से अलग होकर छत्तीसगढ़ बना।
2. कर्नाटक (1956)
आज का कर्नाटक एक नवंबर 1956 को तत्कालीन मैसूर राज्य के विस्तार और पुनर्गठन के बाद अस्तित्व में आया। आजादी से पहले कन्नड़ भाषी आबादी अलग-अलग रियासतों और प्रांतों में बंटी हुई थी।
मैसूर रियासत के अलावा कन्नड़ बोलने वाले लोग बॉम्बे प्रेसीडेंसी, हैदराबाद रियासत और मद्रास प्रेसीडेंसी के कुछ हिस्सों में भी रहते थे। अलग-अलग प्रशासनिक व्यवस्थाओं में बंटे होने के कारण भाषा और सांस्कृतिक पहचान के आधार पर एकजुट होने की मांग लंबे समय से उठ रही थी।
कन्नड़ भाषी क्षेत्रों को एक प्रशासनिक इकाई में शामिल करने के लिए 1 नवंबर 1956 को राज्य पुनर्गठन अधिनियम लागू हुआ। इसके तहत पुराने मैसूर राज्य के साथ बॉम्बे, हैदराबाद और मद्रास के कई कन्नड़ भाषी क्षेत्रों को मिलाया गया। इस तरह नए और विस्तारित मैसूर राज्य का निर्माण हुआ। इसका उद्देश्य कन्नड़ भाषा बोलने वाले लोगों को एक साझा प्रशासनिक और सांस्कृतिक पहचान देना था।
शुरुआत में राज्य का नाम मैसूर ही रखा गया, क्योंकि ऐतिहासिक मैसूर रियासत इस क्षेत्र की प्रमुख इकाई थी। हालांकि, राज्य के कई हिस्सों के लोगों को लगता था कि यह नाम पूरे कन्नड़ भाषी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व नहीं करता। इस मांग के बाद 1 नवंबर 1973 को मैसूर का नाम बदलकर कर्नाटक कर दिया गया। आज इस दिन को कर्नाटक राज्योत्सव के रूप में मनाया जाता है।
3. केरल (1956)
केरल राज्य का गठन भी 1 नवंबर 1956 को हुआ। आजादी से पहले वर्तमान केरल का क्षेत्र मुख्य रूप से त्रावणकोर, कोचीन और मालाबार जैसे अलग-अलग प्रशासनिक हिस्सों में बंटा हुआ था। त्रावणकोर और कोचीन रियासतें थीं, जबकि मालाबार तत्कालीन मद्रास राज्य का हिस्सा था। इन क्षेत्रों में मलयालम भाषा और साझा सांस्कृतिक परंपराओं का प्रभाव था, लेकिन प्रशासनिक व्यवस्थाएं अलग थीं। इसलिए मलयालम भाषी क्षेत्रों को एक राज्य में शामिल करने की मांग लगातार उठती रही।
आजादी के बाद त्रावणकोर और कोचीन को मिलाकर 1949 में त्रावणकोर-कोचीन राज्य बनाया गया। इसके बाद भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की प्रक्रिया तेज हुई। राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के तहत त्रावणकोर-कोचीन के अधिकांश हिस्सों को मालाबार क्षेत्र और दक्षिण कनारा जिले के कासरगोड तालुका के साथ मिलाकर केरल राज्य बनाया गया। वहीं, त्रावणकोर के दक्षिणी हिस्से के कुछ क्षेत्र, जिनमें कन्याकुमारी भी शामिल था, मद्रास राज्य में चले गए।
इस पुनर्गठन के पीछे मुख्य उद्देश्य मलयालम भाषी आबादी को एक साझा प्रशासनिक इकाई में लाना था। तिरुवनंतपुरम को राज्य की राजधानी बनाया गया। हर साल 1 नवंबर को ‘केरल पिरवी दिवस’ मनाया जाता है। ‘पिरवी’ का अर्थ जन्म या स्थापना होता है। इस दिन राज्य की सांस्कृतिक विरासत, भाषा और सामाजिक विकास की यात्रा को याद किया जाता है।
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4. आंध्र प्रदेश (1956)
आंध्र प्रदेश के गठन की कहानी आजादी के बाद भारत में भाषाई आधार पर राज्य बनाने की मांग से गहराई से जुड़ी है। तेलुगु भाषी लोग लंबे समय से अपनी भाषा और सांस्कृतिक पहचान के आधार पर अलग राज्य की मांग कर रहे थे।
उस समय तेलुगु भाषी क्षेत्र का बड़ा हिस्सा मद्रास राज्य में शामिल था। अलग प्रशासनिक पहचान की मांग को लेकर आंदोलन तेज हुआ। इस मांग को प्रमुखता देने वालों में पोट्टी श्रीरामुलु का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन्होंने अलग आंध्र राज्य की मांग को लेकर लंबा अनशन किया और दिसंबर 1952 में उनका निधन हो गया। इसके बाद आंदोलन ने व्यापक रूप ले लिया।
जनदबाव के बाद 1 अक्टूबर 1953 को मद्रास राज्य से अलग आंध्र राज्य बनाया गया। हालांकि, आज के आंध्र प्रदेश का गठन इससे अलग और बाद की घटना है। राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के तहत 1 नवंबर 1956 को आंध्र राज्य का विलय तत्कालीन हैदराबाद राज्य के तेलुगु भाषी तेलंगाना क्षेत्र के साथ किया गया। इस तरह आंध्र प्रदेश अस्तित्व में आया और राजधानी के रूप में हैदराबाद को चुना गया।
तेलंगाना के विलय को लेकर क्षेत्रीय हितों और विकास संबंधी चिंताओं को ध्यान में रखते हुए दोनों क्षेत्रों के नेताओं के बीच एक समझौता भी हुआ, जिसे ‘जेंटलमेन एग्रीमेंट’ कहा जाता है। बाद में 2014 में तेलंगाना अलग राज्य बना और हैदराबाद को निर्धारित अवधि तक दोनों राज्यों की साझा राजधानी बनाया गया।
5. हरियाणा (1966)
हरियाणा का गठन एक नवंबर 1966 को पंजाब के पुनर्गठन के बाद हुआ। आजादी के समय हरियाणा का क्षेत्र तत्कालीन पूर्वी पंजाब का हिस्सा था। उस समय इस इलाके में हिंदी और पंजाबी भाषी आबादी रहती थी। समय के साथ भाषा और क्षेत्रीय पहचान के आधार पर अलग राज्य की मांग तेज होने लगी। पंजाबी सूबा आंदोलन के दौरान पंजाब को पंजाबी भाषी और हिंदी भाषी क्षेत्रों में बांटने का सवाल प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बन गया। हिंदी भाषी क्षेत्रों के लिए अलग राज्य बनाने की मांग भी जोर पकड़ती गई।
इस मांग पर विचार करने के लिए केंद्र सरकार ने अप्रैल 1966 में न्यायमूर्ति जे.सी. शाह की अध्यक्षता में एक सीमा आयोग बनाया। आयोग को यह सुझाव देना था कि पंजाबी और हिंदी भाषी क्षेत्रों की सीमाएं किस तरह तय की जाएं। आयोग ने 31 मई 1966 को अपनी रिपोर्ट सौंपी। इसके बाद संसद ने पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 पारित किया। यह व्यवस्था एक नवंबर 1966 से लागू हुई और हरियाणा भारत का नया राज्य बना।
हरियाणा में तत्कालीन पंजाब के हिंदी भाषी क्षेत्रों को शामिल किया गया। वहीं, पंजाब के कुछ पहाड़ी क्षेत्रों को हिमाचल प्रदेश में स्थानांतरित किया गया। चंडीगढ़ को केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया और इसे पंजाब तथा हरियाणा, दोनों की राजधानी के रूप में रखा गया।
6. पंजाब (1966)
पंजाब का इतिहास एक नवंबर 1966 के पुनर्गठन से जुड़ा है। हालांकि पंजाब इससे पहले भी एक राज्य के रूप में मौजूद था, लेकिन 1966 में हुए बदलाव ने इसकी सीमाओं और प्रशासनिक स्वरूप को काफी हद तक बदल दिया।
आजादी के बाद पूर्वी पंजाब के रूप में मौजूद इस क्षेत्र में पंजाबी और हिंदी भाषी आबादी रहती थी। पंजाबी भाषा को गुरुमुखी लिपि के साथ राज्य की प्रमुख पहचान बनाने और पंजाबी भाषी क्षेत्र के लिए अलग राज्य की मांग ने राजनीतिक आंदोलन का रूप लिया। दूसरी ओर, हिंदी भाषी क्षेत्रों में अलग हरियाणा राज्य बनाने की मांग उठ रही थी।
इन मांगों पर विचार करने के लिए केंद्र सरकार ने 1966 में शाह आयोग का गठन किया। आयोग ने भाषाई आधार पर क्षेत्रों की सीमाएं तय करने की सिफारिश की। इसके बाद संसद ने पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 पारित किया, जो एक नवंबर 1966 से लागू हुआ। इसके तहत हिंदी भाषी क्षेत्रों को अलग कर हरियाणा बनाया गया, जबकि पंजाब के कुछ पहाड़ी इलाकों को हिमाचल प्रदेश में शामिल किया गया। चंडीगढ़ को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिया गया और इसे दोनों राज्यों की राजधानी बनाया गया।
7. छत्तीसगढ़ (2000)
छत्तीसगढ़ का गठन एक नवंबर 2000 को मध्य प्रदेश से अलग होकर हुआ। यह क्षेत्र लंबे समय तक मध्य प्रदेश का हिस्सा रहा, लेकिन इसकी अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक, भाषाई और सामाजिक पहचान थी।
यहां आदिवासी समुदायों की बड़ी आबादी रहती है। इसके अलावा छत्तीसगढ़ी भाषा, लोकगीत, त्योहार और परंपराएं इसे आसपास के क्षेत्रों से अलग पहचान देती हैं। क्षेत्र के लोगों का मानना था कि भोपाल से संचालित बड़े राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था में उनकी स्थानीय जरूरतों और समस्याओं को पर्याप्त प्राथमिकता नहीं मिल पा रही है।
अलग राज्य की मांग अचानक पैदा नहीं हुई थी। इसके पीछे कई दशकों का सामाजिक और राजनीतिक प्रयास था। क्षेत्रीय संगठनों और नेताओं ने अलग प्रशासनिक इकाई बनाने की मांग उठाई। उनका तर्क था कि अलग राज्य बनने से स्थानीय संसाधनों का बेहतर उपयोग हो सकेगा और शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, सिंचाई तथा आदिवासी क्षेत्रों के विकास पर अधिक ध्यान दिया जा सकेगा।
आखिरकार संसद ने मध्य प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2000 पारित किया। तत्कालीन राष्ट्रपति के.आर. नारायणन ने 25 अगस्त 2000 को इस अधिनियम को मंजूरी दी और एक नवंबर 2000 से छत्तीसगढ़ भारत का 26वां राज्य बन गया। रायपुर को इसकी राजधानी बनाया गया। राज्य गठन के बाद स्थानीय प्रशासन और विकास योजनाओं को अलग ढंग से संचालित करने का अवसर मिला। आज छत्तीसगढ़ अपनी खनिज संपदा, वन क्षेत्रों, आदिवासी संस्कृति और प्राकृतिक संसाधनों के लिए जाना जाता है।
