बिना भौतिक उपस्थिति, कोई कारोबार नहीं: भारत में क्रिप्टो प्लेटफॉर्म्स के लिए स्थानीय कार्यालय क्यों जरूरी हैं?

बिना भौतिक उपस्थिति के चल रही सेवाएं बना रही हैं छाया बाजार, बढ़ रहा है आर्थिक जोखिम

20 जुलाई 2025, नई दिल्ली

पिछले कुछ वर्षों में भारत सरकार ने क्रिप्टो सेक्टर को नियंत्रित करने की दिशा में उल्लेखनीय कदम उठाए हैं। इस पूरी प्रक्रिया के हर चरण में सरकार के उद्देश्य स्पष्ट रहे हैं — मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम कानून (PMLA) के तहत क्रिप्टो कंपनियों पर रिपोर्टिंग की बाध्यता से लेकर आयकर अधिनियम में कई महत्वपूर्ण संशोधन तक। लेकिन इसके बावजूद कई विदेशी क्रिप्टो प्लेटफॉर्म भारतीय कानून के दायरे से खुद को बाहर मानते हुए बच निकलते हैं — यह कहकर कि वे भारत से बाहर स्थित हैं और उनकी देश में कोई भौतिक उपस्थिति नहीं है। यह स्थिति अब नीतिगत अनुपालन और प्रवर्तन के लिए एक गंभीर चुनौती बन गई है।

साथ ही, इन विदेशी प्लेटफॉर्म्स की भारत में उपयोगकर्ता संख्या लगातार बढ़ रही है। ये पूरी तरह भारतीय कानून के दायरे से बाहर रहकर काम कर रहे हैं, जिससे दोहरा बाजार बनता जा रहा है: एक ओर वे घरेलू प्लेटफॉर्म हैं जो मनी लॉन्ड्रिंग रोधी उपायों और KYC जैसे सख्त नियमों का पालन कर रहे हैं, और दूसरी ओर ‘छाया बाजार’ है — जहां विदेशी कंपनियाँ बिना किसी जवाबदेही के काम कर रही हैं, जिससे न सिर्फ भारतीय उपभोक्ता बल्कि समूची अर्थव्यवस्था अस्वीकार्य जोखिमों के हवाले हो रही है।

यह केवल ‘समान प्रतिस्पर्धा के अवसर’ का मामला नहीं है — यह भारत की वित्तीय संप्रभुता और उपभोक्ता सुरक्षा से जुड़ा मामला है। जब ऐसे प्लेटफॉर्म बिना किसी कानूनी या भौतिक उपस्थिति के काम करते हैं, तब पूंजी का पलायन, कर चोरी और धोखाधड़ी जैसी समस्याओं पर नियंत्रण असंभव हो जाता है।

ये विदेशी प्लेटफॉर्म भारतीय उपभोक्ताओं को लक्षित करते हैं, लेकिन न तो वे भारत में पंजीकृत हैं और न ही भारत में किसी तरह का संचालन करते हैं। ऐसे में भारतीय नियामकों के पास उनके विरुद्ध कोई प्रवर्तनात्मक कार्रवाई करने का विकल्प नहीं रह जाता। जहां एक ओर भारतीय कंपनियाँ हर छोटे-बड़े अनुपालन की चिंता करती हैं, वहीं ये विदेशी इकाइयाँ बिना किसी डर के काम करती रहती हैं।

जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया, इन प्लेटफॉर्म्स की स्थिति इतनी अस्पष्ट है कि न तो उनका भारत में कोई दफ्तर है और न ही एक भी स्थानीय कर्मचारी — यानी वे पूरी तरह से जवाबदेही से बचते हुए देश में रोजगार सृजन को भी बाधित कर रहे हैं। यह स्थिति भले नई हो, लेकिन भारत इससे पहले भी ऐसे डिजिटल क्षेत्रों में इसी तरह की चुनौती से जूझ चुका है। उदाहरण के लिए, 2021 में सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशा-निर्देश एवं डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियमों के तहत सोशल मीडिया कंपनियों को भारत में शिकायत निवारण अधिकारी नियुक्त करना अनिवार्य किया गया था, ताकि उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा, त्वरित समाधान और कानून का पालन सुनिश्चित किया जा सके।

इसी तरह, जिन सेक्टरों में संवेदनशील डेटा या वित्तीय लेनदेन शामिल होता है — जैसे डिजिटल भुगतान, टेलीकॉम और प्रसारण क्षेत्र — वहां भी कंपनियों के लिए भारत में दफ्तर खोलना और घरेलू नियमों का पालन करना कानूनी रूप से जरूरी होता है। जब क्रिप्टो प्लेटफॉर्म्स डेटा और पैसे — दोनों से जुड़ी सेवाएं देते हैं, तो उन्हें कम से कम इन्हीं मानकों पर खरा उतरना चाहिए। यदि ऐसा नहीं किया गया, तो भारत एक समानांतर ‘छद्म अर्थव्यवस्था’ को बढ़ावा देगा, जो नियामकीय खामियों का फायदा उठाकर राष्ट्रीय हितों को कमजोर करती है।

आगे बढ़ते हुए, हमें स्पष्ट और सख्त कानूनी प्रावधानों की आवश्यकता है। सबसे ठोस उपाय यह होगा कि भारत में सेवाएं देने वाले हर क्रिप्टो प्लेटफॉर्म को देश में एक विधिक इकाई के रूप में पंजीकरण कराना और एक भौतिक कार्यालय स्थापित करना अनिवार्य किया जाए। दुनिया के कई बड़े देश — जैसे यूरोपीय संघ और जापान — अपने यहां वर्चुअल एसेट प्रदाताओं के लिए यही व्यवस्था पहले से लागू कर चुके हैं।

भारत को अब निर्णायक कदम उठाने होंगे, ताकि देश की डिजिटल वित्तीय संरचना जवाबदेही और संप्रभु निगरानी पर आधारित हो — न कि इस संदेश के साथ आगे बढ़े कि ऐसे नियमों से आसानी से बचा जा सकता है। इन नियमों की अनदेखी से न केवल सरकार के राजस्व को नुकसान होता है, बल्कि आम भारतीय निवेशक को ऐसे जोखिमों से भी दो-चार होना पड़ता है, जिनकी भरपाई उसकी वित्तीय क्षमता से कहीं अधिक हो सकती है।

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