नई दिल्ली, न्यूज ऑफ द डे
1000 रुपए की रिश्वत का मामला, लेकिन असर इतना बड़ा कि 32 साल बाद भी आरोपी को राहत नहीं मिल सकी। दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में पुलिस कांस्टेबल की सज़ा को बरकरार रखते हुए साफ संदेश दिया है कि भ्रष्टाचार चाहे छोटा हो या बड़ा, कानून के शिकंजे से बचना आसान नहीं है।
यह मामला साल 1994 का है, जब महरौली थाने में तैनात एक कांस्टेबल पर आरोप लगा था कि उसने एक व्यक्ति का पहचान पत्र (आईडी कार्ड) लौटाने के बदले ₹1000 की रिश्वत मांगी और ली। उस समय पुलिस चेकिंग के दौरान शिकायतकर्ता का आईडी जब्त किया गया था। बाद में उसे वापस करने के लिए आरोपी ने पैसे की मांग की।
मामले की शिकायत मिलने पर भ्रष्टाचार निरोधक शाखा ने जाल बिछाया। तय योजना के मुताबिक, आरोपी को रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ लिया गया। ट्रायल कोर्ट में सुनवाई के बाद कांस्टेबल को दोषी ठहराया गया और उसे भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराओं 7 और 13 के तहत एक-एक साल की कठोर कारावास की सज़ा सुनाई गई। साथ ही जुर्माना भी लगाया गया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि दोनों सजाएं साथ-साथ चलेंगी।
हालांकि, आरोपी ने इस फैसले को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उसकी दलील थी कि मामले में शिकायतकर्ता की गवाही ही नहीं हुई, इसलिए सज़ा को बरकरार रखना गलत है। बताया गया कि बार-बार समन भेजने के बावजूद शिकायतकर्ता का कोई पता नहीं चल पाया।
लेकिन हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि यदि रिश्वत मांगने और लेने की बात अन्य मजबूत और भरोसेमंद सबूतों से साबित हो जाती है, तो शिकायतकर्ता की अनुपस्थिति कोई बड़ी कमी नहीं मानी जा सकती।
अदालत ने अपने फैसले में नीरज दत्ता बनाम राज्य (दिल्ली सरकार) का हवाला दिया। इस ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि यदि शिकायतकर्ता उपलब्ध नहीं है, या वह बयान से पलट जाता है, तब भी अन्य गवाहों, दस्तावेजों या परिस्थितिजन्य सबूतों के आधार पर रिश्वत का आरोप साबित किया जा सकता है।
इस मामले में भी अदालत ने पाया कि स्वतंत्र ‘पंच गवाह’ की गवाही बेहद मजबूत और विश्वसनीय थी। गवाह ने साफ तौर पर बताया कि आरोपी ने रिश्वत मांगी और उसे स्वीकार किया। कोर्ट ने कहा कि इस गवाही पर संदेह करने का कोई ठोस कारण सामने नहीं आया।
इसके अलावा, आरोपी ने मुकदमा चलाने की मंजूरी को भी चुनौती दी थी। उसका कहना था कि मंजूरी देने वाले अधिकारी के पास ऐसा करने का अधिकार नहीं था। लेकिन अदालत ने इस दलील को भी खारिज करते हुए कहा कि अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त के पास आरोपी को नौकरी से हटाने की शक्ति थी, इसलिए वही इस मामले में अभियोजन की मंजूरी देने के लिए सक्षम प्राधिकारी थे। अंत में, हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले में किसी भी तरह की कमी या खामी नहीं पाई। अदालत ने आरोपी की अपील खारिज करते हुए उसकी सज़ा को बरकरार रखा।
