चार दिवसीय आयोजन में राजस्थान और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कारीगरों को बिना बिचौलिए प्रत्यक्ष बाज़ार मिला, जिससे रिकॉर्ड बिक्री, व्यापक दर्शक भागीदारी और दीर्घकालिक खरीदार संबंध बने।
नई दिल्ली | 10 जनवरी 2026
इंडियन ट्रस्ट फॉर रूरल हेरिटेज एंड डेवलपमेंट (ITRHD) द्वारा आयोजित 12वां वार्षिक शिल्प महोत्सव नई दिल्ली में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। चार दिनों तक चले इस आयोजन ने राजस्थान के सीमावर्ती क्षेत्रों और पूर्वी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों के कारीगरों को शहरी बाज़ारों से सीधे जोड़ते हुए अब तक की सबसे अधिक बिक्री दर्ज की।
लोदी एस्टेट स्थित एलायंस फ़्रांसेज़ में आयोजित इस महोत्सव में कारीगरों को बिना किसी मध्यस्थ के अपने उत्पाद सीधे खरीदारों तक पहुँचाने का अवसर मिला। आयोजकों के अनुसार, कुल बिक्री ₹50 लाख के आंकड़े को पार कर गई, जिससे यह संस्करण व्यावसायिक सफलता और कारीगरों को मिली दृश्यता—दोनों ही दृष्टियों से उल्लेखनीय बन गया।
महोत्सव में पश्चिमी राजस्थान के भारत–पाकिस्तान सीमा से सटे बाड़मेर ज़िले की पारंपरिक कलाओं के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ ज़िले की समृद्ध शिल्प परंपराएँ प्रदर्शित की गईं। बाड़मेर के कारीगरों ने कढ़ाई, एप्लिके, चमड़ा शिल्प, धरी बुनाई और अजरख प्रिंटिंग जैसी कलाओं का सजीव प्रदर्शन किया। वहीं आज़मगढ़ के मुबारकपुर की हथकरघा बुनाई और निज़ामाबाद की प्रसिद्ध काली मिट्टी की कुम्हारी कला दर्शकों के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र रहीं।
महोत्सव की उपलब्धियों पर प्रतिक्रिया देते हुए आईटीआरएचडी की सह-परियोजना निदेशक एवं ट्रस्टी, मॉरीन लीब्ल ने कहा कि इस वर्ष की प्रतिक्रिया यह प्रमाणित करती है कि प्रत्यक्ष बाज़ार पहुँच कारीगरों के लिए निर्णायक बदलाव ला सकती है। उन्होंने कहा कि ₹50 लाख से अधिक की बिक्री केवल आर्थिक सफलता नहीं, बल्कि हस्तनिर्मित उत्पादों के प्रति बढ़ती जन-रुचि और वर्षों से किए जा रहे सतत प्रयासों का परिणाम है।
आईटीआरएचडी की प्रोजेक्ट्स डायरेक्टर, मधु खत्री ने कहा कि इस संस्करण की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि कारीगरों को अपनी बिक्री से होने वाली पूरी आय सीधे प्राप्त हुई। उन्होंने बताया कि ऐसे मंच न केवल आय सृजन में सहायक होते हैं, बल्कि कारीगरों और खरीदारों के बीच भरोसे पर आधारित दीर्घकालिक संबंध भी विकसित करते हैं, जो शिल्प परंपराओं के संरक्षण के लिए आवश्यक हैं।
निज़ामाबाद की ब्लैक पॉटरी इस वर्ष भी महोत्सव की प्रमुख पहचान बनी रही। पिछले एक दशक में इस शिल्प को पुनर्जीवन मिला है और 2022 में जी7 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इसे भेंट किए जाने के बाद इसे वैश्विक पहचान प्राप्त हुई। प्रदर्शनी में प्रदर्शित कई कृतियाँ उसी मूल कारीगर परिवार के सदस्यों द्वारा निर्मित थीं, जो इस परंपरा के पुनरुत्थान से जुड़े रहे हैं।
इसके अतिरिक्त, आज़मगढ़ के हरिहरपुर गाँव की सांस्कृतिक विरासत को भी मंच मिला, जो बनारस घराने की शास्त्रीय संगीत परंपरा से जुड़ा है। महोत्सव के दौरान आयोजित विशेष शास्त्रीय संगीत प्रस्तुति ने आयोजन को सांस्कृतिक गहराई प्रदान की।
आईटीआरएचडी पिछले कई वर्षों से बाड़मेर और अन्य क्षेत्रों के कारीगरों के साथ निरंतर कार्य कर रहा है। प्रदर्शनी के अलावा, ट्रस्ट डिज़ाइन सहयोग, उत्पाद विविधीकरण और नए बाज़ारों तक पहुँच सुनिश्चित करने पर भी काम करता है, साथ ही भागीदारी से जुड़े खर्च स्वयं वहन करता है ताकि कारीगरों को पूर्ण लाभ मिल सके।
अपने 12वें वर्ष में पहुँचा यह शिल्प महोत्सव अब नई दिल्ली के सांस्कृतिक परिदृश्य का एक अहम हिस्सा बन चुका है। रिकॉर्ड बिक्री, मज़बूत सहभागिता और बढ़ती सार्वजनिक रुचि यह दर्शाती है कि ऐसे संवेदनशील और बाज़ारोन्मुख मंच भारत की शिल्प परंपराओं को सहेजने के साथ-साथ कारीगरों के लिए सम्मानजनक आजीविका सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
